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ASHFAQ ALI (Gulshan khairabadi)
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"गुलशन खैराबादी झील सी तेरी आँख में चेहरा लगता है। जब भी देखा मुझको अपना लगता है।। जो तुमको ये चांँद सा चेहरा लगता है । वो हमको महबूब हमारा लगता है।। आंँखों से एक दरिया बहता है जैसे । झील का पानी आँख में ठहरा लगता है।। माँ रूठी तो रूठ गई अपनी…"
May 24, 2019

Profile Information

Gender
Male
City State
SITAPUR
Native Place
KHAIRABAD
Profession
BUSINESS

ASHFAQ ALI (Gulshan khairabadi)'s Blog

कू-ब-कू शौक़ लिए फिरता है मुझको गुलशन

पत्थरों का रुख़-ए-हस्ती पे गुमाँ होता है l

जब कोई शोला-ए-एहसास धुआँ होता है ll



जिसको इस राह में अहसास जियाँ होता है l

जज्ब-ए-इशक़ वो मकबूल कहाँ होता है ll



आंसुओ में कभी चेहरे की उदासी में कभी l

दर्द जब हद से गुज़रता है अयाँ होता है ll



खून-ए-मजलूम जो होता है ज़मी पर कोई l

मुझ से हस्सास की आँखों से रवाँ होता है…
Continue

Posted on November 12, 2012 at 6:49pm — 1 Comment

दुश्मनी से डर कैसा दोस्ती से डरते हैं

दुश्मनी से डर कैसा दोस्ती से डरते हैं..

खाये हैं फ़रेब इतने हर ख़ुशी से डरते हैं..



जब से आशियाँ अपना जल गया गुलिस्ताँ में..

हो कहीं उजाला हम रौशनी से डरते हैं..



हम तो धूप के राही साथ-साथ सूरज है..

जिस्म जिनके नाज़ुक हैं चाँदनी से डरते हैं..



कुछ न कुछ तो होगा ही इसलिए जहां वाले..

आदमी की सूरत में आदमी से डरते…

Continue

Posted on June 11, 2012 at 9:30pm — 9 Comments

दूसरों का सहारा, सहारा नही

जिंदगी का सफ़र किसको प्यारा नहीं

मौत आये किसी को गवारा नहीं



कर भलाई जो काम आएगी हर तरह

जिंदगी फिर मिलेगी दोबारा नहीं



किस तरह फिर भला मेहरबान हो कोई

तुमने दिल से उसे जब पुकारा नहीं



सूनी-सूनी हैं कश्मीर की वादियाँ

झील में अब कोई भी शिकारा नहीं



जो पहाड़ों से उतरी है गंगोजमन

लौट जाए कोई ऐसी धारा नही



खुद ही अपना सहारा बनो तो बनो

दूसरों का सहारा, सहारा नही



कैसी उलझन है…

Continue

Posted on May 21, 2012 at 11:30pm — 8 Comments

दौरे जाम

जब कभी दौरे जाम होता है
सब यहाँ इंतजाम होता है

सच ही कहता हूँ मेरे साकी के
दोनों हाथों में जाम होता है

और मै उस जगह नही पीता
जिस जगह एहतराम होता है

उसके बच्चों का बस ख़ुदा जाने
किस तरह इंतजाम होता है

डूब कर जब ग़ज़ल कहे शायर
उसका पुख्ता कलाम होता है

शायरी दिल को छू गई जिसकी
उसका महफ़िल में नाम होता है

किस से शिकवा करूँ मैं फिर "गुलशन"
हर तरह मेरा काम होता है

Posted on May 18, 2012 at 10:00pm — 9 Comments

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At 10:22pm on June 5, 2012,
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
said…

मोहतरम अशफ़ाक़ साहब, आपकी ग़ज़ल ’गुलशन बात हमारी रखना’ को विगत माह ओबिओ के मंच पर की सर्वश्रेष्ठ रचना चयनित हुई है. मेरी ओर से दिली मुबारक़बाद कुबूल करें.आपकी मौज़ूदग़ी लिखने वालों के लिये उत्प्रेरण का काम करेगी, यह विश्वास है.

सादर

At 6:54pm on June 5, 2012,
सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari
said…

अशफाक अली जी आपकी रचना को महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना चुनने पर आपको हार्दिक बधाई

At 4:22pm on June 5, 2012, Abhinav Arun said…

आपकी कृति को महीने की श्रेष्ठ रचना चुने जाने पर हार्दिक बधाई जनाब अशफाक अली साहब !!

At 2:59pm on June 5, 2012, डॉ. सूर्या बाली "सूरज" said…

गुलशन भाई बहुत बहुत बधाई हो महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना मंच को देने के लिए !!

At 1:33pm on June 5, 2012,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय गुलशन खैराबादी जी ,

सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आप की ग़ज़ल "गुलशन बात हमारी रखना" को महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना (Best Creation of the Month) पुरस्कार के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको पुरस्कार राशि रु ५५१ और प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस नामित कृपया आप अपना नाम (चेक / ड्राफ्ट निर्गत हेतु) तथा पत्राचार का पता व् फ़ोन नंबर

admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे |
शुभकामनाओं सहित


आपका
गणेश जी "बागी"

संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

 
 
 

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