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Dr T R Sukul
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Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-40 (विषय: दृष्टि)
"घिनट्टे कृषि मजदूर गफलु और उसकी पत्नी ने उत्साह से अपने लड़के का नाम रखा ‘दशरथ’, पर वे दोनों उसे ‘जसरत’ कहकर पुकारते। एक दिन जब वे दोनों अन्य मजदूरों के साथ खेतों में काम कर रहे थे और सभी के बच्चे मेड़ पर खेल रहे थे तभी जमीदार…"
Jul 30
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-93
"विनम्र आभार आदरणीय।"
Jul 13
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-93
"विनम्र आभार आदरणीया।"
Jul 13
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-93
"विनम्र आभार आदरणीया।"
Jul 13
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-93
"आदरणीय आप को यह रचना अच्छी लगी इसके लिए विनम्र आभार प्रकट करता हूँ। जहाँ तक अन्य रचनाकारों की रचनाओं पर टिप्पणी करने का प्रश्न है उस पर मैं क्या कहूँ , मैं भी आपलोगों के साथ लिखना सीख ही रहा हूँ। आप सभी लोग मेरी तुलना में बहुत ही अच्छा लिखते हैं अतः…"
Jul 13
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-93
"विनम्र आभार आदरणीया।"
Jul 13
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-93
"मरीचिका ====== कल, ए काल !मैं, तेरे साथ ही आया था।वादा था, साथ साथ चलने का , चलते रहने का। आज,तू मुझसे कितना आगे निकल गया.....!नहीं नहीं... .. मैं रह गया हॅूं तुझसे बहुत पीछे.... ..!इसलिये कि,मैंने रुक कर, देखना चाहा इस प्रकृति के प्रवाह को,पल पल…"
Jul 13
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-39 (विषय: समीकरण")
"पका आम ‘‘वैसे ही इस साल आम कम फले हैं और ये तोते, गिलहरियाॅं सब खाए जा रहे हैं’’ कहते हुए सुलोचना ने लम्बा सा बाॅंस उठाया और आॅंगन में लगे पेड़ पर कई बार ठोकर देकर सभी तोते और गिलहरियों को भगा दिया। पास में खड़ी उसकी चार पाॅंच…"
Jun 29
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-92
"अन्तिम क्षण ------------- उस दिव्य चेतना के उन्मुक्त प्रवाह में छिटके,कुछ कण, मेरी झोली में पड़े,उन्हें समेटा, सहेजा औरपल्लवित पुष्पित होने कादिया सुअवसर। उनके फलित होने परआनन्दातिरेक से गदगद......मैं, घूमता था सब ओर,इस बात से अनभिज्ञकि, एक दिन,…"
Jun 15
Dr T R Sukul added a discussion to the group आध्यात्मिक चिंतन
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प्राणायाम से संबंधित जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य

111 प्राणायाम से संबंधित जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्यहमारे देश के अमूल्य ज्ञान ‘ योग विज्ञान ’ को पूरे विश्व ने अब महत्व देना प्रारंभ किया है तो रातों रात अनेक प्रकार के योग गुरुओं की भरमार हो गई है। अपने अपने ज्ञान के हिसाब से वे जन सामान्य में इसे केवल खेल की तरह सिखा रहे हैं जबकि यह एक व्यावहारिक विज्ञान है। विज्ञान का नियम है कि पहले सैद्धान्तिक रूप से तथ्य को समझना और उसके बाद उसकी व्यावहारिक पद्धति को कुशल व्यक्ति से सीखकर उनकी देखरेख में प्रयोग करना चाहिए तभी सफलता मिलती है । आजकल…See More
Jun 14
Dr T R Sukul added a discussion to the group आध्यात्मिक चिंतन
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गति और प्रगति

197 गति और प्रगतिकहा जाता है कि यह व्यक्त जगत देश, काल और पात्र (अर्थात् टाइम, स्पेस और पर्सन) के अनुसार गतिशील है। अव्यक्त स्थिति में देश, काल और पात्र न होने से गतिशीलता भी नहीं है । प्रत्येक अस्तित्व गतिशील है, हमारे शरीर का प्रत्येक स्नायुतन्तु, स्नायुकोष, खून की प्रत्येक बूॅंद , मन, सभी कुछ गतिशील बना हुआ है। क्यों? इसलिए कि गति जीवन का धर्म है और गतिहीनता है मृत्यु। विद्वान लोग कहा करते हैं कि मन को स्थिर बनाओ, यह कहना त्रुटिपूर्ण लगता है क्योंकि यदि मन रुक गया तो उसकी प्रगति भी रुक…See More
Jun 7
Dr T R Sukul replied to vijay nikore's discussion PAIN .. PRAYER.. AND GRATITUDE … a perspective in the group आध्यात्मिक चिंतन
""Non-attachment" to all the worldly thought and action as taught in Shrimadbhagvadgiita is the only way to remain unaffected from pleasure and pain. It requires a long practice to achieve this stage, but it is attainable. The practice…"
Jun 7
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-38 (विषय: "डर")
"डर‘‘ क्यों दादा ! उस दूकान पर नौकरी करने वाले ये सज्जन कौन हैं, उम्र के अंतिम समय में भी बड़ी तल्लीनता से जुटे रहते हैं, किसी से बातचीत भी नहीं करते और हमेशा प्रसन्न ही देखे जाते हैं’’‘‘ कौन ? वो…"
May 30
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-91
"क्या लक्ष्य भी उसका है कोई? भाव भूषित अलंकृत सुरंगों से, अंक में लघु सरोवर तरंगों से ,भावभंगिम उदासीन अंगों से, खंडहर देख प्राचीन दुर्गों के, एकदम ऐसा आभास होता है, वीर वल्लभ रहा होगा कोई। भूमि पर मुक्त वक्रित सी सरिता, वन हो गिरि हो या मैदान…"
May 11
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-37 (विषय: भारत)
"आदरणीय मोहन बेगोवाल जी कथा के अनुमोदन हेतु विनम्र आभार।"
Apr 30
Dr T R Sukul replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-37 (विषय: भारत)
"आदरणीया कल्पना जी , कथा के अनुमोदन हेतु विनम्र आभार।"
Apr 30

Profile Information

Gender
Male
City State
Sagar Madhyapradesh
Native Place
Sagar
Profession
Retired from govt service since 8/2012
About me
I have been a lecturer in physics for twenty years and then worked as education officer, assistant director deputy director , etc and now working in the field of spiritual science and yogic science.

लौकी

लौकी
------
‘‘ अरे, सेठजी ! नमस्कार। अच्छा हुआ आप यहीं सब्जी बाजार में मिल गए, मैं तो आपके ही घर जा रहा था। समाचार यह है कि महाराज जी पधारे हैं, उनका कहना है कि इस एरिया में अहिंसा मंदिर का निर्माण कराना है जिसमें आपका सहयोग... ..।‘‘
‘‘ जी बिलकुल ! मेरी ओर से ग्यारह हजार , शाम को आपके पास पहुॅंचा दूॅंगा।‘‘
यह सुनकर, सब्जी का थैला टाॅंगे सेठजी के शिष्यनुमा नौकर से न रहा गया वह बोला,
‘‘सेठजी ! अभी आपने सब्जी की दूकान पर लौकी लेते समय लम्बी बहस के बाद, पूरे बाजार में बीस रुपये प्रति किलो रेट मिल रही लौकी पन्द्रह रुपये में खरीद कर ही साॅंस ली, जबकि इनके एक इशारे पर ग्यारह हजार रुपये दे दिए ?‘‘
‘‘ अरे तू नहीं समझेगा, पाॅंच रुपया अधिक देता तो वह पता नहीं उनका किस प्रकार दुरुपयोग करता , बीड़ी या शराब पीने में लगाता, परन्तु इस प्रकार बचाकर हमने मंदिर के काम में लगा दिया उससे तो सब लोगों का भला ही होगा ?‘‘
‘‘ पर आपने ही तो सिखाया है कि किसी को भी मन, कर्म और वचन से कष्ट पहुँचाना हिंसा कहलाती है। आपने उस किसान को आर्थिक नुकसान पहुॅंचाकर मानसिक कष्ट दिया जो लाभ के लिये नहीं अपनी आजीविका के लिए सब्जी बेचने बाजार में आया है। तो, इस प्रकार हिंसा करके जोड़ा गया धन अहिंसा मंदिर में लगाने पर क्या उसकी पवित्रता खंडित न होगी ? ‘‘
‘‘ अरे! प्रवचन न दे, चल आगे, अभी और बहुत कुछ खरीदना है, तू क्या यह नहीं जानता कि सब्जी उगाने से लेकर बेचने तक की क्रियाओं में किसानों के द्वारा कितने जीवों की हिंसा होती है ? तो क्या सब्जी भाजी खाना छोड़ देना चाहिए ? ‘‘
‘‘ वही तो मैं कह रहा हॅूं कि आप अहिंसा अहिंसा चिल्लाते हैं पर हिंसा से अर्जित भोजन करने से चूकते नहीं । आपकी कथनी और करनी में अन्तर क्यों है, मुझे आपके यहाॅं नौकरी नहीं करना। सम्हालो अपना थैला , मैं तो चला, इस माह के चार दिन का मेरा वेतन भी मेरी ओर से मंदिर को दे देना।‘‘
(मौलिक और अप्रकाशित )

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लघुकथा

लखूचंद 

=====

एक दिन कालेज के कुछ युवक लखूचंद के सामने ही उसकी जमकर तारीफ कर रहे थे ,

‘‘‘ अरे ये तो लखूचंद के एक हाथ का कमाल है , दोनों हाथ होते तो पूरे जिले में मिठाई के नाम पर केवल इन्हें ही जाना जाता। लेकिन यार , ये तो बताओ कि दूसरा हाथ क्या जन्म से ही ऐसा है या बाद में कुछ हो गया ?‘‘

बहुत दिन बाद लखूचंद को अपनी जवानी के दिन याद आ गए, बोले ,



‘‘ युवावस्था में मैं यों ही बहुत धनवान होने का सपना देखा करता । पिताजी कहते थे कि मैं उनकी हलवाई की दूकान सम्हालूं…

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Posted on March 26, 2017 at 11:54am — 1 Comment

लौकी (लघुकथा)

‘‘ अरे, सेठजी ! नमस्कार। अच्छा हुआ आप यहीं सब्जी बाजार में मिल गए, मैं तो आपके ही घर जा रहा था। समाचार यह है कि महाराज जी पधारे हैं, उनका कहना है कि इस एरिया में अहिंसा मंदिर का निर्माण कराना है जिसमें आपका सहयोग... ..।‘‘

‘‘ जी बिलकुल ! मेरी ओर से ग्यारह हजार , शाम को आपके पास पहुॅंचा दूॅंगा।‘‘

यह सुनकर, सब्जी का थैला टाॅंगे सेठजी के शिष्यनुमा नौकर से न रहा गया वह बोला,

‘‘सेठजी ! अभी आपने सब्जी की दूकान पर लौकी लेते समय लम्बी बहस के बाद, पूरे बाजार में बीस रुपये प्रति किलो…

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Posted on March 6, 2017 at 10:00pm — 12 Comments

केवल तुम

51

केवल तुम

=======

मैं बार बार मन ही मन हर्षित सा होता हॅूं,

हर ओर तुम्हारा ही तो अभिनन्दन है।

मन मिलने को आतुर फिर भी कुछ डर है सूनापन है,

हर साॅंस बनाती नव लय पर संगीत अनोखी धड़कन है,

अब तो हर द्वारे आहट पर तेरा ही अवलोकन है,

मैं इसीलिये नवगीत कंठ करता रहता हॅूं

हर शब्द में बस तेरा ही तो आवाहन है।

मन की राह बनाकर इन नैनों के सुमन बिछाये हैं,

मधुर मिलन की आस लिये ये अधर सहज मुस्काये हैं,

हर पल बढ़ते संवेदन…

Continue

Posted on November 26, 2016 at 12:45pm — 6 Comments

प्रदूषण

151  प्रदूषण



जिंदगी जन्म से डूबी थी अश्रुसागर में,

अब तो लहरों के भंवर और भी गहरा रहे हैं!!



सांस की आस ले बाहर की ओर झाॅंका तो,

प्रदूषण की भभक से ही चेतना थर्रा गई।

डूबती उतरा रही नव कल्पनायें भी

घड़कते घड़घडाते घोष से घबरा गई।

विषैले गगनभेदी विकिरणों के दीर्घ ध्वज लहरा रहे हैं!!



स्वार्थी अर्थलोलुप वणिकवृत्ति व्याप्त घर घर में

मनुष्यता हर मनुज से दूर, कोसों दूर पाई।

परस्पर निकटतम संबंध भी दूषित विखंडित,

आत्मीयता, भ्रातृत्व और…

Continue

Posted on August 7, 2016 at 3:18pm

Comment Wall (5 comments)

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At 3:54pm on February 17, 2016, Sushil Sarna said…

आदरणीय टी आर शुक्ल जी, ओ बी ओ द्वारा आपकी माह की सर्वश्रेष्ठ रचना के चयनित होने पर आपको हार्दिक बधाई। 

At 11:59pm on February 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय डॉ. टी. आर. शुक्ल जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी कविता "कवच और कुंडल" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 10:43pm on December 2, 2015, Dr T R Sukul said…

Your attention is requested sir, towards my poems posted recently.

Respectfully,

Dr TRSukul.

At 3:15pm on August 15, 2015, vijay nikore said…

आदरणीय शुक्ल जी,

आपकी १९८५ की कविता पढ़कर आनन्द आया...सुन्दर भाव और शब्द संयोजन।

आपसे ऐसी ही और भी कविताएँ मिलेंगी, यह आशा है।

सादर

विजय निकोर

At 3:35am on August 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

स्वागत अभिनन्दन 

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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आप अपनी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ यहाँ पोस्ट (क्लिक करें) कर सकते है.

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ओबीओ पर प्रतिमाह आयोजित होने वाले लाइव महोत्सवछंदोत्सवतरही मुशायरा व लघुकथा गोष्ठी में आप सहभागिता निभाएंगे तो हमें ख़ुशी होगी. इस सन्देश को पढने के लिए आपका धन्यवाद.

 
 
 

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