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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – January 2016 Archive (6)

एक दिन आऊँगा मिलनें, प्रलय बनकर के मनुज।।- पर्यावरण की चेतावनी पंकज की लेखनी से

मैं धरा पर्यावरण कुछ कह रहा तुमसे मनुज।

धरा है माता तुम्हारी मैं पिता सुन ले मनुज।।



धरा का मातृत्व मुझसे, आभरण धरती का मैं।

धरा है तब तक सुहागन, सकुशल जब तक हूँ मैं।।



मैंने तुझको तन दिया, शाक का भोजन दिया।

जन्तु सह-जीवन दिया, और खनिज संसाधन दिया।।



मृदा-अग्नि-जल-पवन, निर्मित है तन मेरा मनुज।

अंश तू मेरा ही है, किया धरा नें धारण मनुज।।



तूने मेरे विविध अंगों का अतिशोषण किया।

क्या बताऊँ तूने मुझमें, कितना परिवर्तन… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 17, 2016 at 5:00pm — 5 Comments

वतन में रोग हैं कई दवा ज़रूरी है...............ग़ज़ल इस्लाह के लिए

1222 1212 12 1222

वतन में रोग हैं कई दवा ज़रूरी है।
चलन हो प्रीत का नई फ़िज़ा ज़रूरी है।।

ख़ुदा औ ईश का ये फर्क बस भरम ही है।
ये सच है तू सभी से ये बता ज़रूरी है।।

कहीं जो प्यार हो मिला किसी को जबरन तो।
मुझे भी वो कथा ज़रा सुना ज़रूरी है।।

दिलों की डोरियाँ तो त्याग ही से जुड़ती हैं।
दिलों की नफ़रतें अमाँ मिटा ज़रूरी है।।

घना अँधेरा आसमान पर जो छाया है।
दिया-ए-इश्क़ सबके दर जला ज़रूरी है।।

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 14, 2016 at 2:45pm — 10 Comments

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ........

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।



ये चोरी छिनैती अपहरण की घटना

बालात्कार और अभिहरण वाली घटना

मगर,

करना कुछ मैं नहीं चाहता हूँ

हाँ !

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।



गर्भस्थ शिशु की हत्या न चाहूँ

स्त्री को उसका अधिकार चाहूँ

मगर,

लड़ना खुद मैं नहीं चाहता हूँ

हाँ !

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।



गरीबों के आँसूं द्रवित कर रहे हैं

भूखे ये बच्चे दुखित कर रहे हैं

मगर,

मरना खुद मैं नहीं चाहता… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 12, 2016 at 10:50pm — 8 Comments

पता घाट पर अब लिखाने चले हम- ग़ज़ल (पंकज मिश्र)

122 122 122 122

कि जश्ने मोहब्बत मनाने चले हम।

जी धड़कन को अपनी सुलाने चले हम।।



कि साँसों ने मेरी मना कर दिया है।

ये तन ख़ाक में अब मिलाने चले हम।।



सफ़र ज़िन्दगी का बहुत हो चूका अब।

लो प्रियतम के दिल में समाने चले हम।।



कि अब तक भ्रमित ही किया बादलों नें।

हाँ भ्रम सारे अब तो मिटाने चले हम।।



कि जिनके लिए नैन प्यासे रहे हैं।

नयन उनके झरनें बनाने चले हम।।



कि अब देखना है हुश्ने हुनर भी।

विरह वेदना क्या बताने चले… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 6, 2016 at 12:27am — 12 Comments

मेरे वश में है ही नहीं-ग़ज़ल (पंकज के मानसरोवर से)

22122-22122-2222-2212

उनसे ख़फ़ा हो करके रहूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।

उनकी नज़र में आँसूं भरूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।।



उनकी ख़ुशी का मालिक हूँ मैं, उनकी चाहत मेरी ख़ुशी।

कोई शिकन उस माथे पढूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।।



नादान हैं वो मुझको पता है, मौसम का उन पर भी असर।

इल्ज़ाम उनके सर पे धरूँ मैं, मेरे वश में है ही नहीं।।



कैसे शिकायत उनसे करूँ मैं, वो कुछ ऐसे मिलते ही हैं।

उनकी अदा से कैसे बचूँ मैं, मेरे वश में है ही… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 3, 2016 at 11:55am — 3 Comments

सदी 16 वें साल में आ गयी है- नव वर्ष विशेष ग़ज़ल (पंकज के मानसरोवर से)

शब्दों की माला सुमन भाव निर्मित।

सभी प्रियजनों को मैं करता समर्पित।



नव वर्ष के आगमन की घड़ी में।

हृदय से शुभेच्छाएँ करता हूँ अर्पित।।



सदी 16वें साल में आ गयी है

ये यौवन हाँ जीवन में सबके अपेक्षित।।



खुशियाँ सदा द्वार पर आपके हों।

कलम से यही कामनाएँ हैं प्रेषित।।



कि धन-धान्य, सुख-शांति से घर भरा हो।

हर कामना आप सबकी हो पूरित।।



न मन न हीं तन न ही धरती गगन ये।

किसी हाल "पंकज" नहीं हो… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 2, 2016 at 8:40am — 7 Comments

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