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इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ........

इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।

ये चोरी छिनैती अपहरण की घटना
बालात्कार और अभिहरण वाली घटना
मगर,
करना कुछ मैं नहीं चाहता हूँ
हाँ !
इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।

गर्भस्थ शिशु की हत्या न चाहूँ
स्त्री को उसका अधिकार चाहूँ
मगर,
लड़ना खुद मैं नहीं चाहता हूँ
हाँ !
इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।

गरीबों के आँसूं द्रवित कर रहे हैं
भूखे ये बच्चे दुखित कर रहे हैं
मगर,
मरना खुद मैं नहीं चाहता हूँ।
हाँ !
इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।

कतल बलवा वाली समस्या न चाहूँ।
व्यभिचार पशुवत् तो बिल्कुल न चाहूँ।
मगर,
खुद सुधरना नहीं चाहता हूँ।
हाँ !
इन्हें रोकना मैं बहुत चाहता हूँ।।


मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 5, 2016 at 7:47pm
आदरनीय फूल सिंह सर सादर आभार
Comment by PHOOL SINGH on January 15, 2016 at 10:13am

बहुत ही सुन्दर रचना , आप बहुत बहुत बधाई

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2016 at 10:35pm
आदरणीय समर कबीर सर सादर धन्यवाद
Comment by Samar kabeer on January 13, 2016 at 6:01pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,वाह बहुत ख़ूब,इस शानदार रचना के लिये ढेरों बधाई स्वीकार करें |
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2016 at 2:51pm
आदरणीय शैख़ शहज़ाद सर तारीफ के लिए शुक्रिया।

सुझाव शिरोधार्य है, प्रयास करने का वादा भी
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 13, 2016 at 2:27pm
"हम सुधरेंगे, जग/युग सुधरेगा"... जन जागरण का दायित्व निभाती रचना के लिए तहे दिल बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा 'वात्सयायन' जी। यदि आप इसे सार छंद या छन्न पकैया सार छंद में भी पेश कर सकें, तो और मज़ा आयेगा!
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 13, 2016 at 1:11pm
आदरणीय विजय सर सादर प्रणाम्।

रचनाकर्म को प्रोत्साहित करने के लिए हृदय तल से आभार
Comment by Dr. Vijai Shanker on January 13, 2016 at 10:42am
सुन्दर एवं सही , सुन्दर अभिव्यक्ति , आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी ,
हम उनके आँसू रोकना चाहते हैं ,
करते कुछ नहीं , कर कुछ नहीं पाते , बस ,
कभी - कभी दो चार आँसू खुद बहा देते हैं।
बधाई।

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