आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी
सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं।
स्थिति हो विषम भी तो घरें धीर निज हिय , राह अपने लिए जो स्वयँ ही बनाते हैं।।
रण ही है जीवन का नाम दूजा मान कर, कार्य में निरत पग पीछे न हटाते हैं।
जग में मनुज वे ही सदा ही सभी के लिए, कर्मवीरता के प्रतिमान बन जाते हैं।।1।।
रहें नहीं भाग्य के भरोसे पछताएँ नहीं, पथ की विषमताओं को जो पहचाने हैं।
हों नहीं निराश न ही कोशिशों से मुख मोड़ें, किसी हार से जो कभी हार नहीं…
Added by रामबली गुप्ता on January 30, 2026 at 1:05pm — 1 Comment
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