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Aleem azmi's Blog – April 2010 Archive (4)

यादें बस यादें उनकी

हम जब उनको दिल स भुलाने लगते है
और ज्यादा वोह याद आने लगते है

मुझे न जाने क्या क्या कह देते है वोह
मैं कुछ कह दूं तो वो शर्माने लगते है

दिल में किसी के बस जाना आसान नहीं
काम कठिन है इस में ज़माने लगते है

याद तेरी आ जाती है तब काम बहुत
हम जब मुश्किल में घबराने लगते है

आज कोई "अलीम" स चुपके स बोला
आप मुझे जाने पहचाने लगते है .....

Added by aleem azmi on April 19, 2010 at 10:02pm — 5 Comments

ज़ख्मे दिल

रोज़ एक ज़ख्म नया दिल पे लगाया तूने

मेरी हंसती हुई आँखों को रुलाया तूने









खो चुका था मै गमो दर्द के सन्नाटों में

मेरी बेताब तमन्ना को जगाया तूने









मेरी उल्फत को न समझी है न समझेगी कभी

जब भी फुर्सत मिली इस दिल को दुखाया तूने









गैर की बज़्म सजाने के लिए तूने सनम

मुझसे हर रोज़ बहाना ही बनाया तूने









तेरा एक एक सितम हंस के "अलीम" ने सहा

उसके lab पर कभी शिकवा तो न पाया… Continue

Added by aleem azmi on April 17, 2010 at 7:04pm — 4 Comments

dil - e - pareshaan

अब तो दिन ढल चूका है चले आईये
दिल धड़कने लगा है चले आईये

जाने फिर अब मुलाकात हो न हो
दिल लबों पर रुका है चले आईये

भीग कर रुक न जाए कही आज फिर
देखो बादल उठा है चले आईये

दिल परेशा है नींद आती नहीं
दीप बुझने लगा है चले आईये

दिल की दहलीज़ पर आकर रुक क्यों गए
सारा घर आपका है चले आईये

मेरे दिल में एक काँटा चुभा है "अलीम"
ख़त उन्होंने लिखा है चले आईये

Added by aleem azmi on April 15, 2010 at 4:37pm — 6 Comments

दीए चाहत के

आँखों में बस के दिल में समां कर चले गए
ख्वाब्दीदा ज़िन्दगी थी जगा कर चले गए




चेहरे तक आस्तीन वह लाकर चले गए
क्या राज़ था की जिसको छुपाकर चले गए




रगरग में इस तरह समां कर चले गए
जैसे मुझ ही को मुझसे चुरा के चले गए




आये थे दिल की प्यास बुझाने के वास्ते
एक आग सी वह और लगाकर चले गए




lab थर थरा के रह गए लेकिन वो ऐ "अलीम "
जाते हुए निगाह मिलाकर चले गए .

Added by aleem azmi on April 14, 2010 at 11:26am — 5 Comments

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