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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s Blog – April 2015 Archive (4)

देख जलता रोम नीरो सा बजा मत बंशियाँ - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’



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पत्थरों  के  बीच   रहकर  देवता  बनकर  दिखा

दीन मजलूमों के हित में इक दुआ बनकर दिखा

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कर  रहा  आलोचना  तो   सूरजों   की   देर  से

है अगर  तुझमें हुनर तो  दीप सा बनकर दिखा

****

चाँद पानी में  दिखाकर स्वप्न  दिखलाना सहज

बात तब  है  रोटियों  को  तू तवा  बनकर दिखा

****

देख  जलता  रोम  नीरो  सा  बजा मत बंशियाँ

जो हुए  बरबाद  उनको  आसरा  बनकर दिखा

****

है सहोदर  तो  लखन …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 22, 2015 at 10:57am — 9 Comments

गर जाग गया होता अंतस जो अजानों से - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

221  1222  221  1222

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कब  मोह  दिखाती  है  सरकार  किसानों से

मतलब  तो उसे  है बस  दो  चार दुकानों से

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रिश्तों  की  कहाँ कीमत  वो लोग  समझते हैं

है   प्यार  जिन्हें  केवल  दालान  मकानों  से

****

वो  मान   इसे  लेंगे  अपमान   बुजुर्गी  का

तकरार   यहाँ  करना   बेकार   सयानों  से

****

कदमों  को मिला पाए कब साथ नयों का हम

कब  यार  निभाई  है  तुमने  भी  पुरानों  से

****

उस  रोज  यहाँ होगा सतयुग सा  नजारा भी

जिस रोज …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 21, 2015 at 12:16pm — 15 Comments

है रावण नाम तेरा गर चरित को राम जैसा कर -लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

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नगर  भी  गाँव  जैसा  ही  मुहब्बत का  घराना हो

सभी के रोज  अधरों  पर  खुशी  का  ही  तराना हो

*****

बिछा  लेना  कहीं  भी   जाल   जब  चाहे  निषादों सा

मगर  जीवन  में  नफरत ही तुम्हारा बस निशाना हो

*****

है  भोलापन  बहुत अच्छा  मगर छल भी समझ पाए

रचो जग  तुम जहाँ बचपन  भी  इतना  तो सयाना हो

*****

खुशी हो  बाँटनी  जब भी  न  सोचो  गैर  अपनों की

मगर सौ बार तुम सोचो  किसी का दिल दुखाना हो

 *****

नई…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 5, 2015 at 10:41am — 11 Comments

जमाना और था जब प्यार आँसू पोंछ देता था - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222    1222     1222 1222

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ये कैसी  हलचलें  नवयुग  बता  तेरी  रवानी में

बचे  भूगोल  में  नाले  नदी   किस्से  कहानी में

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बनीं नित नीतियाँ ऐसी हुकूमत हो किसी की भी

नफा व्यापार  में  बढ़चढ़  रहे  फाका किसानी में

****

दिलों का जोश ठंडा है, उमर कमसिन उतरते ही

बुढ़ापा  हो गया हावी  सभी  पर  धुर  जवानी में

****

जमाना  और  था  जब  प्यार  आँसू पोंछ  देता था

मगर अब अश्क मिलते हैं मुहब्बत की निशानी में…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 2, 2015 at 11:00am — 12 Comments

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