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VIRENDER VEER MEHTA's Blog – June 2015 Archive (5)

"थकी हुयी सी जिन्दगी"

थकी हुयी सी जिन्दगी,

थका हुआ मुकाम है।

कौन सी जगह है ये,

हर कोई परेशान है।।

सुबह की धूप शाम है,

शाम रात सी घनी।

हवा मे क्या ये घुल रहा,

फिज़ा जहर सी बनी।

कहाँ आ गये है हम,

हर कोई हैरान है।।

अजनबी है हर कोई,

अजनबी है ये जहाँ।

मोबाईल वैब से जुडे,

दिलो के फासले यहाँ।

हर किसी का नाम है,

पर हर कोई बेनाम है।।

थकी हुयी सी जिन्दगी,

थका हुआ मुकाम है।

कौन सी जगह है ये,

हर कोई परेशान है।।



'विरेन्दर… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 28, 2015 at 9:22am — 13 Comments

वारिस - लघुकथा

रात के दूसरे पहर बड़े जेठ को साल भर पहले ही विधवा हुयी मंझली जिठानी के कमरे से निकलते देख नवविवाहित छोटी बहू सकते में आ गयी। पति के गोलमोल जवाबो से संतुष्टी नही हुयी तो अगली सुबह ही मौका देख बड़ी जिठानी के कमरे में जा पहूँची।

"जीजी! एक बात कहूं।" दबी जुबान में सारा मामला सामने रखती हुयी पूछने लगी। "मंझली जीजी के हालात की 'मजबूरी' तो मन्ने कुछ समझ भी आवे से पल इस अनर्थ को देख आप भी चुप रही, वो काहे?"

"छोटी बहू। कभी कभी शौर मचावन से ज्यादा चुप रहना जरूरी होवे से।" बड़ी जिठानी ने आॅखें… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 23, 2015 at 4:21pm — 9 Comments

कुदरत - लघुकथा

"खुदा का कहर तो खुदा का ही है पर ये सब तो हमने किया। टूटे हुए आशियाने, स्याह काले रंगों में बदलती हरियाली और उपजाऊ जमीन को बंजर करती बारूदी तबाही। आखिर दहशतगर्दी को ख़त्म करने के लिए क्या यही एक रास्ता था?" अपनी 'कमांडरशिप' में किये 'आपरेशन' के बाद इलाके को एक नज़र देखते हुए वो सोच रहा था।

इस वीरान धरती को देख, इस खेल में खुद की हिस्सेदारी के लिए, बतौर इनाम लगे तमगे भी अब उसे चुबने लगे थे। मन का बोझ जब खुद का भार सहने में नाकाम हो गया तो अश्को के रस्ते बह निकला। फलक की और देखता हुआ वो कह…

Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 13, 2015 at 1:01pm — 9 Comments

आठवां फेरा - कथा

"सातवां फेरा सम्पन्न हुआ, माता पिता वर-वधू को को आशीर्वाद देने के लिये आगे आये।" पंडितजी की आवाज पर बधाई गान के साथ साथ लोग भी बधाई के लिये अग्रसर होने लगे।

"नही पंडितजी। अभी एक फेरा बाकी है, आठवां फेरा।" प्रधानजी की आवाज ने सब के चेहरे प्रश्नवाचक बना दिये लेकिन प्रश्न करने की चेष्टा कोई नही कर पाया कयोंकि कस्बे के सम्मानित प्रधानजी का अनादर करने की तो कोई सोच भी नही सकता था। कुछ देर के मौन के बाद आखिर पड़ितजी ने ही प्रश्न किया। "ये क्या कह रहे है आप? सभी जानते है कि हमारे शास्त्ररो मे भी… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 8, 2015 at 5:39pm — 22 Comments

कोई मांग रहा, कोई छीन रहा।

कोई मांग रहा,

कोई छीन रहा।

तेरा मेरा करता मानव,

सब पा कर भी क्यों दीन रहा।



पत्थर युग से,

मंगल युग तक।

सूरत बदली मूरत बदली,

मन से फिर भी हीन रहा।



छू ले चांद,

कई बार भले।

पर धरती की अनदेखी है,

जहां बचपन कूड़ा बीन रहा।



क्षण भर 'देवी',

फिर खेल खिलौना।

धरा गगन को रोना आया,

तू ईश होकर भी,

समाधि में ही लीन रहा।



जीत लिया जग,

बना सिकंदर।

जाते जाते अपने दो क्षण,

विश्व विजेता मुर्दो…

Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 2, 2015 at 7:00pm — 17 Comments

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