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जयनित कुमार मेहता's Blog – July 2016 Archive (3)

सावन में (ग़ज़ल)

धूप सर पर चढ़ी है सावन में

तिश्नगी हर घड़ी है सावन में



आँखें भीगीं हैं और लब सूखे

आंसुओं की झड़ी है सावन में



जेठ की सोने-चाँदी सी धरती,

हीरे-मोती जड़ी है सावन में



तुझको देखूँ कि इन बहारों को

सामने तू खड़ी है सावन में



बादलों! अब न भाग पाओगे

हाँ, सुरक्षा कड़ी है सावन में



सूख जाएं न फिर ये अश्क़ मेरे

इसलिए हड़बड़ी है सावन में



दो किनारों को फिर मिलाने "जय",

इक नदी चल पड़ी है सावन में



(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on July 27, 2016 at 5:38pm — 10 Comments

मैं ग़ज़ल कहने लगा (ग़ज़ल)

2122 2122 2122 212



नींद टूटी, ख़्वाब टूटे, मैं ग़ज़ल कहने लगा

रात, दिन, लम्हात बदले, मैं ग़ज़ल कहने लगा



अक्स उसका दिल में उतरा,जैसे कोई शाइरी,

जागते, सोते, ठहरते मैं ग़ज़ल कहने लगा।



अपने दिल का हाल मुझको उन से कहना था,मगर

सामने आकर वो बैठे,मैं ग़ज़ल कहने लगा।



उनके आने से फ़िज़ा में जश्न का माहौल है,

छेड़ दी सरगम घटा ने,मैं ग़ज़ल कहने लगा।



तज्रिबे इतने दिए थे ज़ीस्त ने मेरी..मुझे,

तज्रिबों से ले के मिसरे, मैं ग़ज़ल कहने… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on July 12, 2016 at 2:53pm — 6 Comments

ग़म पे अब कहकहे लगाता हूँ (ग़ज़ल)

2122 1212 22(112)



ग़म पे अब कहकहे लगाता हूँ।

खुद ही अपना मज़ाक उड़ाता हूँ।



अश्क़ आँखों में छलछलाएँ लाख़,

गीत लेकिन ख़ुशी के गाता हूँ।



अब तो बे-नूर इक सितारे सा,

वक़्त बेवक़्त टिमटिमाता हूँ।



वक़्त क्या तोल पाएगा मुझको,

वक़्त का वज़्न मैं बताता हूँ।



बाद मुद्दत के चुक नहीं पाया,

जाने कैसा उधार-खाता हूँ।



मैं हूँ दीनारों की खनक, प्यारे

मैं ही इस दौर का विधाता हूँ।



ठोकरों से करूँ गिला कैसे,

तज्रिबे तो… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on July 5, 2016 at 7:00pm — 5 Comments

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