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साज-श्रृंगार व्यर्थ है तेरा (ग़ज़ल)

2122   1212   22

जितना बढ़ते गए गगन की ओर
उतना उन्मुख हुए पतन की ओर

साज-श्रृंगार व्यर्थ है तेरा
दृष्टि मेरी है तेरे मन की ओर

फल परिश्रम का तब मधुर होगा
देखना छोड़िए थकन की ओर

मन को वैराग्य चाहिए, लेकिन
तन खिंचा जाता है भुवन की ओर

"जय" भी एकांतवास-प्रेमी है
इसलिए आ गया सुख़न की ओर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Samar kabeer on September 12, 2022 at 4:31pm

जी अवश्य !  पटल पर आपका पुन: स्वागत है I 

Comment by जयनित कुमार मेहता on September 11, 2022 at 11:33am

आदरणीय सतविन्द्र जी, उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद।

Comment by जयनित कुमार मेहता on September 11, 2022 at 11:32am

आदरणीय समर कबीर जी आदाब, बहुत दिनों बाद मेरा इस मंच पर लौटना हुआ है। आशा करता हूं, पहले की तरह आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा। आपका हार्दिक आभार। सादर।

Comment by जयनित कुमार मेहता on September 11, 2022 at 11:29am

आदरणीय बृजेश जी, बहुत बहुत धन्यवाद आपका।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on September 10, 2022 at 4:48pm

आदरणीय जयनित भाई, बहुत बढ़िया ग़ज़ल।

Comment by Samar kabeer on September 10, 2022 at 11:09am

जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 9, 2022 at 10:31pm

अच्छी ग़ज़ल कही भाई... बधाई

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