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Manan Kumar singh's Blog – August 2015 Archive (9)

गजल(मनन)

जिंदगी है जब किसीके नाम आये जिंदगी,

जिंदगी है जब कभी पैगाम लायेे जिंदगी।

जिंदगी है कह रही तेरी कथा अबतक हसीं,

जिंदगी है जब किसीके काम आये जिंदगी।

जा रही तू अब तलक है कामिनी इठला अरी,

जिंदगी है जब कहीं मोक़ाम आये जिंदगी।

तू रही अबतक बरस पर धूम ही छाता गया,

जिंदगी है जब बरस कोंपल खिलाये जिंदगी।

पड़ रही बेकल गले अपने-पराये कर रही,

जिंदगी है जब ठहर सीने लगाये जिंदगी।

गा रही गुनगुन हमेशा धुन हवाओं की रही,

जिंदगी है जब किसीका दर्द गाये… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 31, 2015 at 5:38pm — 2 Comments

गजल(मनन)

2212 2122
मूरत बनी रंग भरते!
दोस्ती निभा दंग करते!
कोई बना कुछ रहा अब
कुछ तो नियम भंग करते।
उनकी कथा क्या कहूँ अब
हिन्दी हसीं तंग करते।
लिखते अलिपि आँख मूँदे
सब रंग बद रंग करते।
वह तो खड़ी, है भरी वह,
वे छेड़ क्यूँ अंग करते?
"मौलिक व अप्रकाशित"@ मनन
खड़ी=खड़ीबोली
छेड़=छेड़छाड़
अलिपि=लिपि से बाहर

Added by Manan Kumar singh on August 23, 2015 at 10:30pm — 8 Comments

गजल(मनन)

घटायें(गजल)

2212 2212 2212

उड़ती घटायें आ चली जातीं कभी,

बरसीं नहीं,ना देख नहलातीं कभी।

चक्कर चलाती हैं हवा के संग वे,

रूप पर उछलतीं खूब इतरातीं कभी।

घूमीं घटायें घात में, बेबाक कब?

रहतीं सदा उड़ती कहीं जातीं कभी।

तू तो रहा उम्मीद पाले बूँद की,

आँखें तरस जातीं,घटा भाती कभी।

बदलीं घटायें बार कितनी कह सकोगे?

बदली भिंगोती प्यार ले छाती कभी।

तूने कहा सुन लो घटाओ पास आ,

बेख़ौफ़ यूँ उड़ती ठहर पाती कभी!

रूप की उड़ी पाती घटायें हैं… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 17, 2015 at 10:00am — 8 Comments

गजल(मनन)

बंदगी एक स्वतंत्र देश की

2212 2212

अपना गगन अपना चमन!

अपनी धरा अपना वतन!

रातें गयीं तम भी गया,

ऐसा लगा बदला चलन।

खुली हवा साँसें गहन,

होगा नया सब कुछ वहन।

आसां नहीं आशा रही,

खींचे गये खाँचे गगन।

धूमों पटा तेरा गगन,

तू तो रहा अपने मगन।

रेखा लगा धरती गगन,

उसने तलाशा निज गगन।

तेरा गगन तू दूर अब,

तेरी धरा कितना क्षरण!

जीवन लिया तेरी दया,

बाँटे उसीने तो मरण।

खोजा कभी दंभी कहाँ?

कर दो उसे झंडा… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 11, 2015 at 9:30am — 4 Comments

गजल(मनन)

गजल
2122 2122 2122
तू कहीं जा ओ यहाँअब खैर ही कब?
तोड़कर दिल वो कहेंगे गैर ही कब?
है बसी बस्ती यहाँ उन बागवां की,
लूटते जो दिल कहें की सैर ही कब?
बैठ तेरे पहलू' मन की बात करते,
नोच बखिया खूब बोले गैर ही कब?
आ कहेंगे हम रहे कबसे रे बुलाते,
रे निभायी है वफ़ा बस बैर ही कब?
है नदी साग़र नहीं जल तो बहुत है,
तिर किनारे तू लगे अब खैर ही कब?
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन
साग़र=प्याला
'=मात्रा-पतन
बागवाँ=बागवाले

Added by Manan Kumar singh on August 9, 2015 at 12:03pm — 7 Comments

गजल (मनन)

गजल

122 122 122

उजाले डराने लगे हैं,

अँधेरे बुलाने लगे हैं।

विभा दीपकों से मिली थी,

जलाते ! बुझाने लगे हैं।

किताबें रखी थीं यहीं तो,

न माने,जलाने लगे हैं।

हुनर की कहूँ क्या?न पूछो,

मरे,कुछ ठिकाने लगे हैं।

नहीं है पता खुद,वहीअब

मुझे कुछ बताने लगे हैं।

न देखूँ, रिसाने लगे वे,

दिखें तो लजाने लगे हैं।

करूँ क्या कभी तो नजर है,

कभी वे बचाने लगे हैं।

भुलाता,न भूले कभी वे,

मुआ याद आने लगे हैं।

रही थीं धुनें चुप… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 8, 2015 at 6:00pm — 3 Comments

गजल(मनन)

2122 2122

मेघ जब होता सजल है,

नेह हो जाता नवल है।

ख्वाहिशों की दूब सूखी,

चाहती कुछ तो चपल है।

देह जो बेसुध पड़ी है,

ढूँढती फिर से पहल है।

शब्द कबसे कर रहा अब,

भाव भूले की टहल है।

मौन रुख अब माँग लूँ मैं,

मन अभी जाता मचल है।

होंठ सूखे,जीभ जलती,

लद गये हैं मेघ जल है।

भींग जाने दो अभी भी,

मान तेरा जो अचल है।

मानता हूँ मानिनी मैं,

प्यार तेरा तो अतल है।

मान जा,री मान तज कर,

आखिरी मेरी पहल है।

"मौलिक व… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 4, 2015 at 8:30pm — 10 Comments

गजल

गजल
2212 2212
हर बार मजहब मत उठा,
नाचीज अब भौं मत चढा।
जो हो न कुछ, तो मत बजा,
आका, कभी कुछ मत बना।
रोटी पकी, अब चुप रहो,
जनता जली,जन मत जला।
झंडे उठा तू था गया,
दे कर उसे, तूने छला।
मजहब भला करता कि वह
हरदम रहा मरता चला?
ढोते रहे बस भार-से,
ईमान तो उनकी बला।
बोले कि मानेंगे सभी
मजहब,कभी बातें भला?
उसने कहा आगे न जा,
तेरी धता,फिर भी चला।
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on August 1, 2015 at 9:38am — 2 Comments

गजल

यक्षोवाच-

गजल

2122 2122 212

मेघ खबरें अब न ले जाते वहाँ?

बरसते भी अब न,वे आते वहाँ?

भाव मेरे नाम तेरे ले गये,

क्या पता क्या गीत वे गाते वहाँ।

झाँक लेना तू कभी जब मेघ हो,

बाँच लेना तू फुहारें हे वहाँ।

कामिनी तू, काम मैं,ले कामना

मचलता हूँ,बात पहुँचाते वहाँ?

पवन को दी है उसाँसें,उड़ चला,

देख लेना,श्वास उर भाते वहाँ?

दिल धड़का जब,खबर होगी वहाँ,

देख अब ये कब पहुँचाते वहाँ।

सूखकर काँटा हुईं अब पुतलियाँ,

बरस जातीं जो सजल… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 1, 2015 at 8:30am — 6 Comments

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