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Sushil Sarna's Blog – August 2024 Archive (11)

दोहा त्रयी .....वेदना

दोहा त्रयी. . . . वेदना

धीरे-धीरे ढह गए, रिश्तों के सब दुर्ग ।
बिखरे घर को देखते, घर के बड़े बुजुर्ग ।।

विगत काल की वेदना, देती है संताप ।
तनहा आँखों का भला , सुनता कौन विलाप ।।

बहुत छुपाया हो गई, व्यक्त उमर की पीर ।
झुर्री में रुक रुक चला, व्यथित नयन का नीर ।।

सुशील सरना / 28-8-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 28, 2024 at 2:00pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . प्रेम

दोहा पंचक. . . . प्रेम

प्रेम चेतना सूक्ष्म की, प्रेम प्रखर आलोक ।

प्रेम पृष्ठ है स्वप्न का, प्रेम न बदले मोक । ।

( मोक = केंचुल )

प्रेम स्वप्न परिधान है, प्रेम श्वांस की शान ।

प्रेम अमर इस भाव के , मिटते नहीं निशान ।।

प्रेम न माने जीत को, प्रेम न माने हार  ।

जीवन देता प्रेम को, एक शब्द स्वीकार ।।

प्रेम सदा निष्काम का , मिले सुखद  परिणाम ।

दूषित करती वासना, इसके रूप तमाम ।।

अटल सत्य संसार का, अविनाशी है प्रेम ।

भाव…

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Added by Sushil Sarna on August 25, 2024 at 3:30pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . . असली - नकली

दोहा पंचक .....  असली -नकली

हंस भेस में आजकल, कौआ बाँटे ज्ञान ।

पीतल सोना एक से, कैसे हो पहचान ।।

अपनेपन की आड़ में, लोग निकालें बैर ।

कौन किसी के वास्ते,  आज माँगता खैर ।।

अच्छी लगती झूठ की, वर्तमान में छाँव ।

चैन मगर मिलता वहाँ, जहाँ सत्य  की ठाँव ।।

धोखा देती है बहुत, अधरों की मुस्कान ।

मन में क्या है भेद कब, होती यह पहचान ।।

रिश्तों में  बुझता नहीं, अब नफरत  का दीप ।

दुर्गंधित जल में नहीं, मिलते मुक्ता सीप…

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Added by Sushil Sarna on August 23, 2024 at 4:41pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . .बारिश का कह्र

दोहा पंचक. . . . . बारिश का कह्र

अविरल होती बारिशें, अब देती हैं घाव ।

बारिश में घर बह गए, शेष नयन में स्राव ।।

निर्मम बारिश ने किया, निर्धन का वो हाल ।

झोपड़ की छत उड़ गई, जीवन बना सवाल ।।

अस्त- व्यस्त जीवन हुआ, बारिश से चहुँ ओर ।

जन जीवन नुकसान से, भीगे मन के छोर ।।

वर्षा का तांडव हुआ, बहे कई प्रासाद ।

शेष बचे अवशेष अब, बने भयंकर याद ।।

कैसे मंजर दे गया, बरसाती तूफान ।

जमींदोज पल में हुए , पक्के बड़े मकान…

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Added by Sushil Sarna on August 22, 2024 at 3:00pm — No Comments

दोहा त्रयी .....रंग

दोहा त्रयी. . . रंग

दृष्टिहीन की दृष्टि में, रंगहीन सब रंग ।
सुख-दुख की अनुभूतियाँ, चलती उसके संग । ।

रंगों को मत दीजिए, दृष्टि भरम का दोष ।
अन्तस के हर रंग का, मन करता  उद्घोष ।।

खुली पलक में झूठ के, दिखते अनगिन रंग ।
एक रंग रहता सदा, सच्चाई के संग ।।

सुशील सरना / 20-8-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on August 20, 2024 at 4:33pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . विविध

दोहा पंचक. . . . . विविध

जीवन के अनुकूल कब, होते हैं हालात ।

अनचाहे मिलते सदा, जीवन में आघात ।।

अपना जिसको मानते, वो देता आघात ।

पल- पल बदले केंचुली ,यह आदम की जात ।।

कहने को हमदर्द सब, पूछें अपना हाल ।

वक्त पड़े तो छोड़ते, हाथों को तत्काल ।।

इच्छा के अनुरूप कब, जीवन चलता चाल ।

सौम्य वेश में पूछता, उत्तर रोज सवाल ।।

मीलों चलते साथ में, दे हाथों में हाथ ।

अनबन थोड़ी क्या हुई, तोड़ा जीवन साथ ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on August 16, 2024 at 8:37pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . .परिवार

दोहा पंचक. . . . . परिवार

साँझे चूल्हों के नहीं , दिखते अब परिवार ।

रिश्तों में अब स्वार्थ की, खड़ी हुई दीवार ।।

पृथक- पृथक चूल्हे हुए, पृथक हुए परिवार ।

आँगन से ओझल हुए, खुशियों के त्यौहार ।

टुकड़े -टुकड़े हो गए, अब साँझे परिवार ।

इंतजार में बुझ गए, चूल्हों  के  अंगार ।।

दीवारों में खो गए, परिवारों के प्यार ।

कहाँ  गए वो कहकहे, कहाँ गए विस्तार ।।

सूना- सूना घर लगे, आँगन लगे उदास ।

मन को कुछ भाता नहीं,  रहे न अपने पास …

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Added by Sushil Sarna on August 9, 2024 at 9:59pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . ख्वाब

दोहा पंचक. . . . . ख्वाब(नुक्ते रहित सृजन )

कातिल उसकी हर अदा, कमसिन उसके ख्वाब ।

आतिश बन कर आ गया, भीगा हुआ शबाब ।।

रुक -रुक कर रुख पर गिरी, सावन की बरसात ।

छुप-छुप कर करती रही, नजर जिस्म से बात ।।

बार - बार गिरती रही, उड़ती हुई नकाब ।

प्यासी नजरों देखतीं, जैसे हसीन ख्वाब ।।

खड़ा रहा बरसात में  , भीगा एक शबाब  ।

रह - रह के होती रही, आशिक नज़र खराब ।।

भीगी बाला से हुआ, नजरों का संवाद ।

ख्वाबों से वो कर गई, इस दिल को आबाद…

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Added by Sushil Sarna on August 4, 2024 at 3:46pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . . . मोबाइल

दोहा सप्तक. . . . . मोबाइल

मोबाइल ने कर दिया, सचमुच बेड़ा गर्क ।

निजता पर देने लगे, युवा अनेकों तर्क । ।

मोबाइल के जाल में, उलझ गया संसार ।

सच्चा रिश्ता  अब यही , बाकी सब बेकार ।।

संवादों का बन गया, मोबाइल संसार ।

सांकेतिक रिश्ते हुए, बौना सच्चा प्यार ।।

प्यार जताने के सभी, बदल गए हालात ।

मोबाइल पर साजना , दर्शन दे साक्षात ।

मोबाइल पर कीजिए, चाहे घंटों बात ।

पत्नी की मत भूलना,पर लाना सौगात ।।

मोबाइल के भूत ने, रिश्ते किये…

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Added by Sushil Sarna on August 3, 2024 at 8:29pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . तूफान

दोहा पंचक. . . . . तूफान

चार कदम पर जिंदगी, बैठी थी चुपचाप ।

बारिश के संहार पर,करती बहुत विलाप ।।

रौद्र रूप बरसात का, लील गया सुख - चैन ।

रोते- रोते दिन कटा, रोते -रोते रैन ।।

कच्चे पक्के झोंपड़े , बारिश गई समेट ।

जन - जीवन तूफान के, चढ़ा वेग की भेंट ।।

मंजर वो तूफान का, कैसे करूँ बयान ।

खौफ मौत का कर गया,  आँखों को वीरान ।।

उड़ जाऐंगे होश जब, देखोगे तस्वीर ।

देख बाढ़ का  दृश्य वो , गया कलेजा चीर ।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on August 2, 2024 at 9:19pm — 4 Comments

दोहा सप्तक. . . . सावन

दोहा सप्तक . . . . सावन

सावन में  अच्छी नहीं, आपस की तकरार ।

प्यार जताने के लिए, मौसम हैं दो चार ।।

बरसे मेघा झूम कर, खूब हुई बरसात ।

बाहुबंध में बीत गई, भीगी-भीगी रात ।।

गगरी छलकी नैन की, जब बरसी बरसात।

कैसे बीती क्या कहूँ, बिन साजन  के  रात।।

थोड़े    से   जागे    हुए, थोड़े   सोये   नैन ।

हर करवट पर धड़कनें, रहती हैं बैचैन ।।

बिन साजन सूनी लगे, सावन वाली रात ।

सुधि   सागर   ऐसे   बहे, जैसे बहे प्रपात ।।

 जितनी बरसें…

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Added by Sushil Sarna on August 1, 2024 at 3:34pm — No Comments

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