जुड़ो जमीं से कहते थे जो, वो खुद नभ के दास हो गये
आम आदमी की झूठी चिन्ता थी जिनको, खास हो गये
सबसे ऊँचे पेड़ों से भी ऊँचे होकर बाँस महोदय
आरक्षण पाने की खातिर सबसे लम्बी घास हो गये
तन में मन में पड़ीं दरारें, टपक रहा आँखों से…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 30, 2013 at 8:39pm — 24 Comments
बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२
दिल हो गया है जब से टूटा हुआ खिलौना
दुनिया लगे है तब से टूटा हुआ खिलौना
खेले न कोई इससे, फेंके न कोई इसको
यूँ ही पड़ा है कब से टूटा हुआ खिलौना
बेटा बड़ा हुआ तो यूँ चूमता हूँ उसको
अक्सर लगाऊँ लब से टूटा हुआ खिलौना
बच्चा गरीब का है रक्खेगा ये सँजोकर
देना जरा अदब से टूटा हुआ खिलौना
‘सज्जन’ कहे यकीनन होंगे अनाथ बच्चे
जो माँगते हैं रब से टूटा हुआ…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 18, 2013 at 10:30pm — 27 Comments
बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२
सत्ता की गर हो चाह तो दंगा कराइये
बनना हो बादशाह तो दंगा कराइये
करवा के कत्ल-ए-आम बुझा कर लहू से प्यास
रहना हो बेगुनाह तो दंगा कराइये
कितना चलेगा धर्म का मुद्दा चुनाव में
पानी हो इसकी थाह तो दंगा कराइये
चलते हैं सर झुका के जो उनकी जरा भी गर
उठने लगे निगाह तो दंगा कराइये
प्रियदर्शिनी करें तो उन्हें राजपाट दें
रधिया करे निकाह तो दंगा…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 12, 2013 at 10:57pm — 33 Comments
बह्र : २२१ २१२१ १२२१ २१२
मिलजुल के जब कतार में चलती हैं चींटियाँ
महलों को जोर शोर से खलती हैं चींटियाँ
मौका मिले तो लाँघ ये जाएँ पहाड़ भी
तीखी ढलान पे न फिसलती हैं चींटियाँ
रक्खी खुले में यदि कहीं थोड़ी मिठास हो
तब तो न उस मकान से टलती हैं चींटियाँ
पुरखों से जायदाद में कुछ भी नहीं मिला
अपने ही हाथ पाँव से पलती हैं चींटियाँ
शायद कहीं मिठास है मुझमें बची हुई
अक्सर मेरे बदन पे…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 10, 2013 at 8:47pm — 29 Comments
जब हमने नहीं खोजा था सोना
तब कहीं नहीं था कोई अमीर या गरीब
सोने की खोज के साथ ही पैदा हुये गरीब
जब हमने नहीं किया था ईश्वर का आविष्कार
तब कहीं नहीं था कोई स्वर्ग या नर्क
ईश्वर की खोज के साथ ही पैदा हुआ नर्क
गरीबों में पैदा हुआ नर्क का डर और स्वर्ग का स्वप्न
जब हमने नहीं किया था धर्म का आविष्कार
तब कहीं नहीं था कोई पापी या पूण्यात्मा
धर्म की खोज के साथ ही पैदा हुये पापी
गरीबों…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 5, 2013 at 7:30pm — 8 Comments
बह्र : २१२२ ११२२ ११२२ २२
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धर्म की है ये दुकाँ आग लगा देते हैं
सिर्फ़ कचरा है यहाँ आग लगा देते हैं
कौम उनकी ही जहाँ में है सभी से बेहतर
जिन्हें होता है गुमाँ आग लगा देते हैं
एक दूजे से उलझते हैं शजर जब वन में
हो भले खुद का मकाँ आग लगा देते हैं
नाम नेता है मगर काम है माचिस वाला
खोलते जब भी जुबाँ आग लगा देते हैं
हुस्न वालों की न पूछो ये समंदर में भी
तैरते हैं तो वहाँ आग…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 1, 2013 at 10:16pm — 12 Comments
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