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Manan Kumar singh's Blog – September 2022 Archive (2)

रूप(लघुकथा)

रूपसी के कोठे पर रसिया लोगों की भीड़ है।सभी अपनी हाल की देहरादून यात्रा का बड़े हौसलापूर्वक वर्णन कर रहे हैं। लखू सेठ, "बड़ी सुखद यात्रा रही,रूपसी बाई।"

गगन बिहारी पांडे बोले,"लगा जैसे स्वर्ग सीधे धरती पर उतर आया हो।"

छोटू दादा: अपुन तो दंग रह गए वहां की अतिथि शाला देखकर।बड़ी भली व्यवस्था थी, देवि।"

अपने प्रति इतना आदरपूर्वक संबोधन सुनकर रूपसी चौंक -सी गई।

"कौन अतिथि शाला,दादा?" रूपसी ने सवाल किया।

"मंजरी सदन।"

"अच्छा।पहुंच ग....ए.....।"रूपसी कहते -कहते रूक…

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Added by Manan Kumar singh on September 16, 2022 at 7:27pm — 5 Comments

दिन ढले,रातें गईं....(गजल)

2122 2122 2122 212

दिन ढले,रातें गईं,बढ़ती ही जाती पीर है

'याद कर जिंदा रहें कल',आपकी तकरीर है। 1

हो रहा सब कुछ हवा तो क्या हुआ तकदीर है

चूमने को पास मेरे आपकी तस्वीर है।2

ले गईं मोती बहाकर जब समद की शोखियाँ

बन रहे तब से घरौंदे और मन मतिधीर है।3

आंसुओं का मोल किसने है चुकाया इस जहां?

सोचता रख लूं संजो इनकी बड़ी तासीर है।4

फूल की ख्वाहिश लिए चलता रहा मैं रात -दिन

क्या हुआ अब सामने…

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Added by Manan Kumar singh on September 8, 2022 at 7:08pm — 2 Comments

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