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अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's Blog – October 2020 Archive (4)

ग़ज़ल (निगलते भी नहीं बनता उगलते भी नहीं बनता)

1222-1222-1222-1222

निगलते  भी  नहीं  बनता  उगलते  भी  नहीं  बनता 

हुई  उनसे  ख़ता  ऐसी   सँभलते  भी   नहीं  बनता 

इजारा  बज़्म  पे ऐसा  हुआ  कुछ   बदज़बानों  का

यहाँ रुकना भी ज़हमत है कि चलते भी नहीं बनता 

जुगलबंदी हुई जब से ये शैख़-ओ-बरहमन की हिट

ज़बाँ  से शे'र  क्या  मिसरा निकलते भी नहीं बनता 

रक़ीबों को  ख़ुशी  ऐसी मिली हमको  तबाह करके

कि  चाहें  ऊँचा उड़ना  पर  उछलते भी नहीं बनता 

ख़ुद…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 29, 2020 at 11:13am — 10 Comments

ग़ज़ल (ज़िन्दगी भर हादसे दर हादसे होते रहे...)

2122 - 2122 - 2122 - 212

ज़िन्दगी   भर   हादसे   दर   हादसे   होते   रहे

और   हम   हालात   पर   हँसते   रहे  रोते  रहे

आए   हैं   बेदार  करने   देखिये   हमको   वही

उम्र  भर  जो  ग़फ़लतों  की  नींद  में  सोते  रहे

 

कर  दिए आबाद  गुलशन  हमने  जिनके वास्ते 

वो   हमारे   रास्तों    में    ख़ार    ही   बोते   रहे 

बोझ  बन  जाते  हैं  रिश्ते  बिन भरोसे  प्यार के

जाने  क्यूँ  हम नफ़रतों  की  गठरियाँ  ढोते …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 11, 2020 at 9:57pm — 5 Comments

ग़ज़ल (हर  ख़ुशी  हर मोड़ पर...)

2122 - 2122 - 2122 - 21- 21

हादिसात   ऐसे   हुए   हैं   ज़िन्दगी   में   बार-बार

हर  ख़ुशी  हर मोड़ पर  रोई  तड़प कर  ज़ार-ज़ार

दर्द  ने   अंँगडाईयाँ  लेकर  ज़बान-ए-तन्ज़  में  यूँ 

पूछा    मेरी   बेबसी   से   कौन   तेरा   ग़म-गुसार

अपनी-अपनी क़िस्मतें  हैं अपना-अपना इंतिख़ाब

दिलपे कब होता किसी के है किसी को इख़्तियार 

रफ़्ता-रफ़्ता जानिब-ए-दिल संग भी आने लगे अब

जिस जगह पर हम  किया करते  हैं तेरा…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 8, 2020 at 11:51am — 4 Comments

ग़ज़ल (न यूँ दर-दर भटकते हम...)

1222 - 1222 - 1222 - 1222

न यूँ दर-दर भटकते हम जो अपना आशियाँ होता

ख़ुदा ने काश हमको भी किया अह्ल-ए-मकाँ होता 

बिछा  के राहों  में काँटे  पता देते  हैं  मंज़िल   का

कोई  तो  रहनुमा   होता  कोई   तो  मेह्रबाँ   होता

ख़ुदा या  फेर लेता रुख़  जो तू भी ग़म के मारों से

तो  मुझ-से  बेक़रारों का ठिकाना फिर कहाँ होता

बने  तुम  हमसफ़र  मेरे  ख़ुदा  का   शुक्र  है वर्ना 

न  जाने  तुम  कहाँ  होते  न  जाने मैं  कहाँ …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 7, 2020 at 8:36am — 3 Comments

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