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Ravi Prakash's Blog – October 2013 Archive (4)

ज़िंदगी ग़ुज़र गई - (रवि प्रकाश)

न बिजलियाँ जगा सकीं,

न बदलियाँ रुला सकीं।

अड़ी रहीं उदासियाँ,

न लोरियाँ सुला सकीं।



न यवनिका ज़रा हिली,

न ज़ुल्फ की घटा खिली।

उठे न पैर लाज के,

न रूप की छटा मिली।



जतन किए हज़ार पर,

न चाँद भूमि पे रुका।

अटल रहे सभी शिखर,

न आस्मान ही झुका।



चँवर कभी डुला सके,

न ढाल ही उठा सके।

चढ़ा के देखते रहे,

न तीर ही चला सके।



वहीं कपाट बंद थे,

जहाँ सदा यकीन था।

जिसे कहा था हमसफ़र,

वही तमाशबीन…

Continue

Added by Ravi Prakash on October 23, 2013 at 12:00pm — 37 Comments

वेदना (रवि प्रकाश)

वितान चाँदनी बुने न रात हो सुहावनी,

न बोलते विहंग हों न भोर हो लुभावनी।

बहार की पुकार पे हवा न गीत गा सके,

विमुक्तकण्ठ कोकिला न रागिनी सुना सके।



विलास हो न हास हो उदास हो वसुंधरा,

हताश अंतरिक्ष हो महान मौन से भरा।

वसंत की सुगंध में घुला हुआ विषाद हो,

बयार में,फुहार में विलाप का निनाद हो।



न प्रीत की परंपरा न गीत हो प्रयाण का,

उमंग की तरंग हो न संग हो कृपाण का।

जले न दीपमालिका न इष्ट देवता मिले,

न इन्द्रचाप सी कभी सुदर्श कल्पना… Continue

Added by Ravi Prakash on October 17, 2013 at 7:50pm — 17 Comments

जिजीविषा - (रवि प्रकाश)

नगरी-नगरी
फूटी गगरी
लेकर पानी
पीना है।
मेरी छानी
गारा-मिट्टी
तेरा आँगन
भीना है।
रेशम-रेशम
तेरा आँचल
मेरा कुर्ता
झीना है।
शैल-शिखर सा
मस्तक तेरा
मेरा बोझिल
सीना है।
दुनिया,तूने
बीच भँवर में
आस-आसरा
छीना है।
अन्धकार में
आँखें फाड़े
जुगनू-जुगनू
बीना है।
खुली हथेली
ख़ाली बर्तन
फिर भी हमको
जीना है।

-मौलिक एवं अप्रकाशित।

Added by Ravi Prakash on October 7, 2013 at 4:30pm — 24 Comments

रामभरोसे - (रवि प्रकाश)

थोथे सपने
उथली नींदें
स्वप्नलोक भी
रीता है।

सारा जीवन
कुरुक्षेत्र है
भूख हमारी
गीता है।

अट्टहास कर
रावण नाचे
बंधन में फिर
सीता है।

किसने सागर
पी डाला है
किसने अंबर
जीता है।

हम क्या जानें
वक़्त हमारा
रामभरोसे
बीता है।

मौलिक व अप्रकाशित।

Added by Ravi Prakash on October 2, 2013 at 6:00pm — 26 Comments

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