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रामनाथ 'शोधार्थी''s Blog – October 2013 Archive (6)

ग़ज़ल (७) : ख़ुदकुशी अच्छी नहीं होती !

बहुत ज्यादा भी हो, पाकीज़गी, अच्छी नहीं होती 

न करना यार मेरे, ख़ुदकुशी, अच्छी नहीं होती//१ 

.

चलो माना, के जीने के लिए, खुशियाँ जरूरी है 

जरा भी ग़म न हो, ऐसी ख़ुशी, अच्छी नहीं होती//२ 

.

भले ही, आह उट्ठे है !!, दिलों से, वाह उट्ठे है !! 

मगर सुन, आँख की, बेपर्दगी अच्छी नहीं होती//३

.

तजुर्बे का, अलग तासीर है, यारों मुहब्बत में 

हमेशा इश्क़ में, हो ताज़गी, अच्छी…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 19, 2013 at 12:19pm — 38 Comments

ग़ज़ल (६) : ज़िंदगी बेचैन करती है !

करूं मै क्या? मेरी आवारगी बेचैन करती है 

बनूँ गर रहनुमा तो, रहबरी बेचैन करती है//१ 

.

समंदर से सटा है घर, मगर लब ख़ुश्क है मेरा 

तेरी जो याद आये, तिश्नगी बेचैन करती है//२ 

.

के अच्छी मौत है, इक बार ही जमकर सताती है 

मुझे दिन-रात, अब ये ज़िंदगी बेचैन करती है//३ 

.

मुहब्बत है मुझे भी, चाँदनी की नूर से लेकिन 

निगाहे-हुस्न तेरी, रौशनी बेचैन करती…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 18, 2013 at 5:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल (५) : वो शाइरी सी है !

फ़िदा है रूह उसी पर, जो अजनबी सी है 

वो अनसुनी सी ज़बाँ, बात अनकही सी है//१ 

.

धनक है, अब्र है, बादे-सबा की ख़ुशबू है 

वो बेनज़ीर निहाँ, अधखिली कली सी है//२ 

.

कभी कुर्आन की वो, पाक़ आयतें जैसी 

लगे अजाँ, कभी मंदिर की आरती सी है//३ 

.

ख़फ़ा जो हो तो, लगे चाँदनी भी मद्धम है 

ख़ुदा का नूर है, जन्नत की रौशनी सी है//४ 

.

वो…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 16, 2013 at 5:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल (४) : बताओ माँ, मेरी चादर कहाँ है !

कहाँ है कील, शर, नश्तर कहाँ है

मेरा काँटों भरा, बिस्तर कहाँ है//१

.

उठा के मार, मंदिर में पड़ा ‘वो’  

भला क्या पूछना, पत्थर कहाँ है//२

.

तभी सोंचू के, मैं क्यूँ उड़ रहा हूँ

अमीरों क़र्ज़ का, गट्ठर कहाँ है//३

.

लगे मय पी रहा है, आज वो भी

जहर पीता था, वो शंकर कहाँ है//४

.

बुराई झाँकती है, देख दिल से

छुपा उसको, तेरा अस्तर कहाँ है//५

.

सपोलें मारने से, कुछ न होगा 

चलो खोजें छिपा, अजगर कहाँ…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 16, 2013 at 4:30pm — 19 Comments

ग़ज़ल (३) : मुझे लड़की बनाना !

मेरे अल्लाह ! तू लड़की बनाना

मुझे आता नहीं, चोटी बनाना//१

.

बनाना चाहता हूँ ‘आदमी’ को

बुरा है पर, ज़बरदस्ती बनाना//२

.

मुझे इक 'माँ' लगे है, देख लूं जो        

सनी मिट्टी लिए रोटी बनाना//३

.

न डूबेगा समंदर में, लहू के  

शिकारी सीख ले कश्ती बनाना//४

.

चला वो, तीर-भाले को पजाने

सिखाया था जिसे बस्ती बनाना//५

.

उजालों से मुहब्बत है, मुझे भी

सिखा दे माँ मुझे तख्ती…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 12, 2013 at 5:00pm — 33 Comments

ग़ज़ल (२) : क़ब्र के पत्थर !

न ज़िंदगी को सजाना, गड़े खज़ाने से

नसीब ‘राख़’ है, साँसों के रूठ जाने से//१

.

खड़े हैं क़ब्र के पत्थर-से लोग चौखट पर   

जवान बेटी की इज्ज़त को यूँ गंवाने से//२

.

पकड़ के पूँछ कलाई, पे बांध लेता मैं

जो मान जाता कभी वक़्त भी मनाने से//३

.

न आफ़ताब को हो फ़िक्र तो मिटेगा क्यूँ 

कोई न फ़र्क है जुगनूँ के दिल जलाने से//४

.

सुना है अश्क़ दवाई से कम नहीं होता   

तो छोड़ रात में पलकों को यूँ नहाने से //५

.

तुझे…

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Added by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 6, 2013 at 1:30pm — 30 Comments

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