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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog – November 2016 Archive (7)

मग़र मड़ई छवानी है, कमाना भी ज़रूरी है------पंकज द्वारा ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222

चलूँ स्कूल लेकिन घर में दाना भी ज़रूरी है

पढूँगा तो मग़र ये घर बचाना भी ज़रूरी है



ग़रीबी श्राप है इस श्राप से है मुक्ति शिक्षा में

मग़र मड़ई छवानी है, कमाना भी ज़रूरी है



मुझे मालूम है कूड़े में मिलते रोग के कीड़े

ये कचरे ही मेरी रोजी, जुटाना भी ज़रूरी है



उसे भी छोड़िये, पिल्लू अभी भैंसें ले जाएगा

बहुत महँगा हुआ दर्रा, चराना भी ज़रूरी है



हमारे गाँव की चट्टी पे, पे टी एम् नहीं होता

तो मुर्री में बचत अपनी छिपाना भी… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 29, 2016 at 11:49pm — 12 Comments

रिश्ते कबाड़ मन में पड़े सड़ रहे थे सब- पंकज द्वारा ग़ज़ल

मस्तिष्क की गली से तू गुज़रा अभी अभी
सोया था दिल जो मेरा वो धड़का अभी अभी

रिश्ते कबाड़, मन में पड़े सड़ रहे थे सब
दीपोत्सव से पहले बहाया अभी अभी

उस्से मिला तो जाना भला कोहेनूर क्या
भटका पथिक मैं राह पे लौटा अभी अभी

सब वक्त का तकाज़ा है सत्ता औ सुल्तनत
सबको सिखा गया है रुपैया अभी अभी

अब नींद आ रही है चलो फिर मिलेंगे कल
सन्देश सबको मैंने ये भेजा अभी अभी

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 23, 2016 at 9:43pm — 7 Comments

हसरत को दफनाया जाए-पंकज द्वारा ग़ज़ल

इक ताबूत मंगाया जाए
हसरत को दफनाया जाए

पतझर से पहले पतझर को
उपवन में बुलवाया जाए

ऐसा कर अब चल रे पंकज
मन का ताप बढ़ाया जाए

परिवर्तन का दौर चला है
रिश्तों को ठुकराया जाए

मोती रोको, गर्द जमेगी
पत्तों को समझाया जाए

बहुत हुआ अब शोर शराबा
धड़कन को समझाया जाए

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 22, 2016 at 1:15pm — 10 Comments

रेट का टैग लगा रिश्तों का बाज़ार मिला- पंकज द्वारा ग़ज़ल

2122 1122 2122 112



ढूँढने प्रीत चला स्वार्थ का उपहार मिला

रेट का टैग लगा रिश्तों का बाज़ार मिला



आदमीयत भी दिखावे की कोई चीज़ हुई

कैमरा ऑन था, दुखिया को बहुत प्यार मिला



न्याय के घर में भी पैसे की खनक हावी हुई

नाचता नोट की गड्डी पे ख़बरदार/जिरहदार मिला



ये अलग बात है तुम ज़िद पे अड़े हो तो मिलो

पर मुझे भूल नहीं पाया जो इक बार मिला



देख दर्पण में हक़ीक़त को चुराता है नज़र

लोभ की कीच में पंकज भी तो बीमार मिला



मौलिक… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 22, 2016 at 7:00am — 6 Comments

आ भी जाओ परी- पंकज द्वारा गीत

तेरे दीदार को ये निगाहें मेरी

कब से व्याकुल हैं विह्वल ये धड़कन मेरी

आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।



आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।।



कितने अरमान मन में सँजोये हूँ मैं

नींद तेरे लिए ही तो खोए हूँ मैं



इस अँधेरे नगर में बिछे चाँदनी

घोल दे ज़िन्दगी में मधुर रागिनी



राग पायल की छम छम सुना सांवरी

आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।



आ भी जाओ परी

आ भी जाओ परी।।1।।



तेरे काजल सजे दोनों चंचल नयन

फूल सा खूबरू… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 21, 2016 at 3:30pm — 7 Comments

और फिर से इक दफ़ा-पंकज मिश्र

और फिर से इक दफ़ा इस, दिल ने धोख़ा दे दिया
सो रहा था, बेवफ़ा का, नाम सुनकर जग गया

और फिर से इश्क़ ने, तूफ़ान की सौगात दी
और हमने यूँ किया की, आज जी भर रो लिया

और फिर से इक दफ़ा हम प्रश्न लेकर हैं खड़े
दोस्ती कैसे निभेगी बोल मेरे साथिया

और फ़िर से इक दफ़ा मिलने वो आये हैं मग़र
हम कफ़न में और वो पर्दानशीं उफ़ ये हया

और फिर से इक दफ़ा पत्थर से गङ्गा बह चली
वत्स कुल में इक भगीरथ फिर हुआ पैदा नया

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 19, 2016 at 4:22pm — 8 Comments

क्या गरज़ है कि अपाहिज के लिए तुम रूक्को----ग़ज़ल

2122 1122 1122 22

क्या गरज़ है कि अपाहिज के लिए तुम भी रुको
अपनी रफ़्तार की तेजी को न यूँ दफ़नाओ

ग़र तुम्हें साथ में चलने में परेशानी है
राह में छोड़ के आगे भी निकल सकते हो

अपने अंदाज़ में चलने का चलन ही है यहाँ
न मना ही है किया और न टोका तुमको

तुम चलो मैं भी मिलूँगा जी वहीँ मंज़िल पर
जाके खरगोश व कछुए की कथा फिर से पढ़ो

राह में रात भी होगी तो किधर जाओगे
मेरी ग़ज़लों की ये सौगात उजाले ले लो


मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on November 13, 2016 at 7:00am — 3 Comments

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