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Manan Kumar singh's Blog – December 2016 Archive (10)

गजल(साल न्य....)

साल नया वह आता कब है
और पुराना जाता कब है?1

चलते रहते खेल-तमाशे
कोई राज बताता कब है?2

मन मुरझाया रहता जब भी
बोलो कुछ भी भाता कब है?3

दिलवर जो चाहत का भूखा
रखता लब से नाता कब है?4

रहता हर पल प्यासा पंछी
बूँद सुधामय पाता कब है?5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on December 31, 2016 at 11:15pm — 18 Comments

गजल(नोटबंदी)

2122 2122

नोट बंदी बावरी-सी

देखते हैं क्या करेगी।1



जो चलन को कैद करते

क्या भला उनसे लड़ेगी?2



बेचलन होते 'पुराने'

क्या 'नयों' से घर भरेगी?3



काठ की हांडी कहें कुछ

क्या नहीं फिर से चढ़ेगी?4



जो हरें दिन के उजाले

क्या नहीं उनको खलेगी?5



बात क्षणभर की नहीं यह

दूर तक आगे चलेगी।6



थम रहा है शोर अब तो

फूल बन कर ही खिलेगी।7



जो अंधेरों से लड़ेगा

रे सुबह उसको मिलेगी।8



कीजिये मन से… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 31, 2016 at 8:39am — 2 Comments

गजल(नोटबंदी)

2122 2122

नोट बंदी जो चलेगी

सोचता हूँ क्या करेगी।1



जो चलन को कैद करते

क्या भला उनसे लड़ेगी?2



बेचलन होते 'पुराने'

क्या 'नयों' से घर भरेगी?3



काठ की हांडी कहें कुछ

क्या नहीं फिर से चढ़ेगी?4



जो हरें दिन के उजाले

क्या नहीं उनको खलेगी?5



बात क्षणभर की नहीं यह

दूर तक आगे बढ़ेगी।6



थम रहा है शोर अब तो

एक कलिका-सी खिलेगी।7



जो अंधेरों से लड़ेगा

रे सुबह उसको मिलेगी।8



कीजिये मन से… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 31, 2016 at 8:30am — 12 Comments

कौवे(लघु कथा)

ताला भुइयां की बेटी आज घर वापस आ गयी है।विधायक लालू भुइयां अपने घर के छोटे-मोटे कामों के लिए उसे सात साल पहले दिल्ली ले गया था।उसके माँ-बाप को बोला था कि उधर रहेगी,सेवा-टहल करेगी।चार पैसे भी मिल जायेंगे।कुछ पढ़-लिख भी जायेगी।ताला ने पत्नी की तरफ देखा था।उसने मौन सहमति दी थी और दस साल की झुनिया दिल्ली चली गयी थी।हाँ,लालू भुइयां पैसे समय से भिजवाता रहा,पर धीरे-धीरे झुनिया की खबर का आना बंद ही हो गया था।पहले झुनिया के माँ-बाप की गाँव के पांडे बाबा के बेटे से लिखवायी चिट्ठी उसे मिला करती थी,वह उसे… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 24, 2016 at 2:47pm — 8 Comments

गजल(काफियों की...)

2122 2122 2122 2

काफियों का बढ़ गया बाजार देखा है

इश्क को होते हुए लाचार देखा है।1



डूबती कश्ती नहीं मँझधार है तो क्या?

हर बखत सहमी नजर में प्यार देखा है।2



लड़ रहा कोई धनुर्धर रोशनी खातिर

व्यूह का निर्माण तो बेकार देखा है।3



सच पराजित हो रहा हर मोड़ पर दिखता

झूठ की गर्दन सजाया हार देखा है।4



माँगते दाता यहाँ पर भीख में हक भी

रहजनों को तो बने सरकार देखा है।5



दे सकेंगे क्या फ़रिश्ते देश को कुछ भी

लूट का हर शख्स है… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 21, 2016 at 7:30pm — 10 Comments

गजल(कोई पहले आज बताये..)

नोट नया भी अब हकलाये
कब तक चलना कौन सुझाये?1

सीमाएँ जब हैं निर्धारित
बोलो कौन धता बतलाये?2

ढूँढ रही हैं रोज कतारें,
तहखाने में क्यूँ रिरियाये?3

छोटे-छोटे नोट चहकते
बंद गुलाबी क्यूँ मुरझाये?4

छापा पड़ता लाला के घर
कलुआ बैठ बड़ा मुसुकाये।5

नोट पुराना जलता-बुझता
ढ़ेर घरों में आग लगाये।6

गदहे खाते खेत फिरें सब
मार जुलाहे के सर आये।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on December 15, 2016 at 8:00pm — 5 Comments

गजल(आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत..)

2122 2122 212

आँधियों से बेखबर पत्ते बहुत

रह गये जो झेलते सहमे बहुत।1



मौन हो बहती हवा,पुचकारती,

अनकहे सब राज हैं गहरे बहुत।2



बेसबर खुद में समंदर डूबता

तैरते हैं बेधड़क तिनके बहुत।3



बह रहा पानी बना सब देखिये,

जो सँजोये लुट गये सपने बहुत।4



डर गये अपना जताने से यहाँ,

वाकये ऐसे हुए अब के बहुत।5



भागते फिरते अँधेरे रात के

रोशनी के जा रहे सदके बहुत।6



सींचने का अब समय तो आ गया

जड़ कटी है पेड़ की पहले… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 14, 2016 at 9:08am — 6 Comments

लघु कथा(गुमान)

#गुमान#(लघु कथा)

***

सुषमा ने तकिया समीर के सिरहाने कर दी थी।अपना सिर किनारे पर रखा था जो कभी ढुलक कर तकिये से उतर गया था।दोनों गहरी निद्रा में निमग्न थे।अचानक समीर ने करवट बदली।दोनों के नथुने टकराये।उसे आभास हुआ कि सुषमा का सिर तकिया पर नहीं, नीचे है।उसने आँखें खोली। उसे महसूस हुआ ,सुषमा दायीं करवट लेटी थी।उसकी उष्ण साँसें समीर को अच्छी लगीं।वह उसे तकिये पर लाने की कोशिश करने लगा।हालांकि वह चाहता था कि काम भी हो जाये और सुषमा की निद्रा भंग भी न हो।पर जैसे उसने उसे बाँहों में लेकर… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 11, 2016 at 1:12pm — 11 Comments

गजल(चिल्लाना क्या सन्नाटा है...)मच रही चिल्ल-पों पर

22222222
चिल्लाना क्या सन्नाटा है,
कह तो क्यूँ रे हकलाता है?1

जोड़ रहा तू कागज कितने
मुँह पर आज पड़ा चांटा है।2

लूट लिया जिसका धन तूने
फिर से काम वही आया है।3

चोर-सिपाही खेल, बता अब
किसके हित अर्थ जुटाया है?4

हँस-हँस कर का मैल बटोरा,
रोने का मौसम आया है।5

लूट लिये कितनों के सपने
अपना जाकर अब टूटा है।6

उछला-कूदा ढ़ेर जगह,पर
गड़ता जाता अब खूँटा है।7
मौलिक व अप्रकाशित @मनन

Added by Manan Kumar singh on December 4, 2016 at 8:01am — 10 Comments

गजल(दाँव पर लगता रहा मैं....)

बंद हुए बैंक नोट का आत्मकथ्य

दाँव पर लगता रहा मैं
आँख में सबकी बसा मैं।1

रूप बदला, रंग बदला,
रात-दिन चंचल चला मैं।2

बन जिगर का पुरशकूं क्षण
घर भरा,कितना सहा मैं।3

फिर चलन से दूर होकर
बे-चलन अब हो गया मैं।4

रो रहा,जगता 'बटोरू',
चैन से अब सो रहा मैं।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on December 1, 2016 at 4:30pm — 10 Comments

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