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डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's Blog – December 2015 Archive (4)

कविता के मर जाने तक

उस दिन जब हम मिले थे 

पहली बार

हम चुप रहे

या यूँ कहो बोल ही न सके

और फिर यूँ ही मिलते रहे

तब तक  

जब तक तुमने शुरु नही किया

बोलना

हालांकि मैं 

बोल न सकी फिर भी

अधर थरथराये जरूर

पर खोल न सकी मुख

पर तुमने जब शुरू किया

तो जाने कहाँ से

शब्दों का समंदर उमड़ पड़ा  

और मैं

उसके घात-प्रतिघात के बीच

खाती रहे हिचकोले

मंत्र-मुग्ध, आतुर, विह्वल  

 

मैं जानती…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 30, 2015 at 4:37pm — 4 Comments

निन्यानबे के फेर में

निन्यानबे के फेर में

हूँ मैं  

लोग देखते है मुझे

ईर्ष्या से या हिकारत से

क्योंकि वे जानते हैं

केवल और केवल एक मुहावरा 

मानव की कमजोर वृत्ति का

धन संचय की उत्कट प्रवृत्ति का

उन्हें यह  पता ही नहीं कि

मुहावरे के पीछे होता है

कोई चिरंतन सत्य या एक इतिहास  

और बहुत सारे मायने

वे सोचते भी नहीं

कि निन्यानबे वे वैशिष्ट्य भी हैं  

जिनके आधार पर  उस ऊपर वाले के है

निन्यानबे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 26, 2015 at 12:00pm — 8 Comments

वह रहस

आदम फितरत है

भई

राम ने आसन्न -प्रसूता

को छोड़ दिया वन में

जीने, भटकने या  मरने 

भला हो वाल्मीकि का --- I

और कुछ ऐसा ही किया

कृष्ण ने राधा के साथ

छोड़ दिया निराश्रित

जीने, भटकने या मरने I

सीता का अंत तो जानते है सभी

इसी माटी में दफ़न हुयी थी कभी

पर राधा ------?

कब तक तकती रही राह ?

भेजती रही पाती और सन्देश

फिर कहाँ गयी वह ?

कैसे हुआ उसका अंत ?

किसी ने भी याद नही रखा

लानत…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2015 at 7:19pm — 2 Comments

अभिलाषा जाग रही

सूने आंगन में जाल बिछा चांदनी रात सोयी रोकर

मेरी अभिलाषा जाग रही रागायित हो पागल होकर

मैं समय काटता रहा विकल

दायें-बायें  करवटें   बदल

घिर आये मानस-अम्बर पर

स्वर्णिम सपनीले बादल-दल

बौराया घूम रहा मारुत अपनी सब शीतलता खोकर  

सपनो में चल घुटनों के बल

सरिता तट पर आया था जब

कह डाला कुछ मन की मैंने

वह बज्र प्रहार हुआ था तब

सायक सा टूटा था अंतस निर्दयता  की खाकर ठोकर  

 यह नाग आँख में है अविरल

छोड़ता निरंतर…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 10, 2015 at 8:30pm — 5 Comments

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