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Amod shrivastav (bindouri)'s Blog – May 2018 Archive (1)

आज खुद को आज कहकर जानता है ..गजल

2122-2122-2122

.

आज खुद को आज कहकर जानता है।।

हल वो बूढ़ा सा शज़र ,पर जानता है।।

किसका कितना पेट भूखा रह गया अब ।

घर का चूल्हा ही ये बेहतर जानता है ।।

कैसा बीता है शरद और ग्रीष्म बरखा।

मुझसे बेहतर घर का छप्पर जानता हैं।।

कैसे कटती हैं मेरी तन्हा सी रातें ।

खाट तकिया और बिस्तर जानता है।।

दर्द के किस दौर से गुजरा हुआ मैं।

आह का निकला ही अक्षर जानता है।।

आमोद बिंदौरी , मौलिक…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on May 24, 2018 at 9:30am — 5 Comments

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