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आसमाँ .....

बहुत ढूँढा
आसमाँ तुझे
दर्द की लकीरों में
मोहब्बत के फ़कीरों में
ख़ामोश जज़ीरों में
मगर
तू छुपा रहा
धड़कन की तड़पन में
यादों के दर्पण में
कलाई के कंगन में
वक्त सरकता रहा
सागर छलकता रहा
अब्र बरसता रहा
मगर
तू न समझा
मैं किसे ढूँढता हूँ
पागल आसमाँ
मैं तो
इस दिल की ज़मी का
आँखों की नमी का
अपनी ज़बीं का
आसमाँ ढूँढता हूँ

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on April 2, 2020 at 8:59pm

'आँखों की नमीं का'--'नमीं'--"नमी"?

Comment by Sushil Sarna on April 1, 2020 at 6:08pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब .... कम्प्यूटर में तकनीकी व्यवधान के कारण एक अरसे के बाद आपसे मिलना हुआ है। विलम्ब के लिए क्षमा। सृजन के भावों को मान देने का दिल से शुक्रिया। सर मैं असल में भीड़ जैसी कुछ बात कहने का प्रयास कर रहा था। मैं इस शब्द का संशोधन कर रहा हूँ। आपकी हर जानकारी मेरे लिए अनमोल और अमूल्य होती है। इंगित त्रुटि को संशोधित कर पुनः प्रेषित कर रहा हूँ। सादर

Comment by Samar kabeer on March 31, 2020 at 3:46pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छी कविता लिखी आपने,बधाई सवीकार करें ।

'ख़ामोश ज़खीरों में'

इस पंक्ति में 'ज़खीरों' 

का क्या अर्थ लिया है आपने?

'आँखों की नमीं का'

इस पंक्ति में 'नमीं' को "नमी" कर लें ।

कृपया ध्यान दे...

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