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अहसास की ग़ज़ल :मनोज अहसास

22  22  22  22  22  22

ज्यादा चिंता से भी आखिर क्या होता है
जो सोचा,अक्सर उसका उल्टा होता है

कह देने से दर्द कहाँ हल्का होता है
कमजोरी का लोगों में चर्चा होता है

शाम ढले तो सब चीज़े धुंधली लगती हैं
सूरज फिर भी अगले दिन उजला होता है

जीवन का चक्कर चलता रहता है यों ही
हरियाली के बाद खेत सूखा होता है

कोई कहता रहता है मन की सब बातें
और किसी का दर्द सदा गूंगा होता है

पीड़ा के लम्हों में तपकर, है ये जाना
हमदर्दी का दावा बस झूठा होता है

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2020 at 7:13pm

आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by मनोज अहसास on June 29, 2020 at 11:17am

हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब

Comment by Samar kabeer on June 24, 2020 at 2:36pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'हरियाली के बाद खेत सूखा होता है'

इस मिसरे की तक़ती'अ करें ।

Comment by मनोज अहसास on June 23, 2020 at 11:28am

नमस्कार आदरणीया

ग़ज़ल पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार

सादर

Comment by Dimple Sharma on June 22, 2020 at 10:55pm

नमस्ते आदरणीय, खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें।

कृपया ध्यान दे...

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