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लोग घर के हों या कि बाहर के...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)

(2122 1212 22/122)

लोग घर के हों या कि बाहर के
प्यार करिएगा उनसे जी भर के

जाने क्या कह दिया है क़तरे ने
हौसले पस्त हैं समंदर के

जिस्म पर जब कोई निशाँ ही नहीं
कौन देखेगा ज़ख़्म अंदर के

दोस्ती उन से कर ली दरिया ने
जो थे दुश्मन कभी समंदर के

एक शीशे से ख़ौफ़ खाते हैं
लोग जो लग रहे थे पत्थर के

एक बस माँ को बाँट पाए नहीं
घर के टुकड़े हुए बराबर के

गरचे हर घर की है कहानी ये
सिर्फ़ चर्चे हुए मिरे घर के

यूँ तो पाबंदियाँ है उड़ने पर
पर निकल आए हैं कबूतर के

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on August 3, 2020 at 2:13pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब सादर नमस्कार,

इस लाजवाब ग़ज़ल पर आपको दिली दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ!

Comment by सालिक गणवीर on August 3, 2020 at 9:28am

आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी मौजूदगी और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.ये आपका बड़प्पन है जनाब, ममनून हूूँ.

Comment by सालिक गणवीर on August 3, 2020 at 9:25am

आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर'साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी मौजूदगी और हौसला अफजाई के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.टंकन त्रुटि दुुुरूस्त कर दूंगा,आदरणीय. 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 2, 2020 at 10:56pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, शानदार ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।

//यूँ तो पाबंदियाँ है उड़ने पर  : इस मिसरे में टंकण त्रुटि 'है' को 'हैं' कर लें। सादर। 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on August 2, 2020 at 10:18pm

आदरणीय सालिक गणवीर साहिब, इस लाजवाब ग़ज़ल पर आपको दिली दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ!

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