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ग़ज़ल को सँवारा है इन दिनों.- ग़ज़ल

मापनी 221 2121 1221 212 

 

हर आदमी ही वक़्त  का मारा है इन दिनों.  

प्रभु के सिवा न कोई सहारा है इन दिनों.  

 

फिरते सभी नक़ाब में चेहरा छुपा-छुपा, 

चारों तरफ अजीब नज़ारा है इन दिनों. 

 

मिलना गले न हाथ मिलाना किसी से तुम,   

रहना सभी से दूर ये नारा है दिनों. 

 

तूफ़ान आँधियों के अलावा न कुछ दिखे, 

कश्ती से इतनी दूर किनारा है इन दिनों.

 

जो भी गए थे शहर सभी लौट आये हैं, 

मौसम हमारे गाँव का प्यारा है इन दिनों.

 

सूखे थे जो दरख़्त हुए सब हरे-भरे,

सावन ने उनको ख़ूब दुलारा है इन दिनों.

 

कैसे कहें कि घर में हमें बोरियत हुई,

बिखरी हुई ग़ज़ल को सँवारा है इन दिनों.

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 10, 2020 at 10:49am

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज'   जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 10, 2020 at 10:48am

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 10, 2020 at 10:48am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसला अफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 8, 2020 at 2:42pm

वाह आदरणीय शर्मा जी बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है...

Comment by नाथ सोनांचली on August 7, 2020 at 4:53pm

आद0 बसन्त कुमार शर्मा जी सादर अभिवादन

समसामयिक विषयो के इर्द गिर्द घूमती बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार कीजिए

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 6, 2020 at 4:49pm

आ. भाई बसंत कुमार जी, सादर अभिवादन ।बेहतरीन गजल हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 6, 2020 at 12:28pm

आदरणीय TEJ VEER SINGH जी सादर नमस्कार 

आपकी हौसलाअफजाई के लिए दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 6, 2020 at 12:28pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी आदाब , आपकी हौसला अफजाई और सुझाव हेतु दिल से शुक्रिया 

इसी तरह मार्गदर्शन करते रहें सादर 

Comment by TEJ VEER SINGH on August 6, 2020 at 11:12am

हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी। बेहतरीन गज़ल।

जो भी गए थे शहर सभी लौट आये हैं, 

मौसम हमारे गाँव का प्यारा है इन दिनों.

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 5, 2020 at 9:48pm

आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। उर्दू के अल्फा़ज़ वक़्त, नक़ाब, दरख़्त और ख़ूब में नुक़ते लगा लें। 

मिसरा "मिलना गले न मिलाना किसी से हाथ,  बह्र में नहीं है देखियेगा, शायद कुछ छूट गया लगता है, मिसरा यूँ भी कर सकते हैं :" "मिलना गले न हाथ मिलाना किसी से तुम" 

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