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शिक्षक है एक कुम्भकार और शिल्पकार 

हम गीली मिट्टी देता हमे वो आकार

उसने ही अच्छे बुरे का ज्ञान करवाया

जीवन रूपी भंवर में कैसे है  तैरना  

ये मेरे गुरु ने मुझे सिखलाया

जैसे नदी में एक नाव माझी बिना 

वैसे ही अज्ञानी हम शिक्षक बिना 

जिंदगी में उसने हमें सही मुक़ाम पर पहुंचाया

जीवन रूपी भंवर में कैसे है तैरना  

ये मेरे गुरु ने मुझे सिखलाया 

उसने कभी कुछ नहीं हमसे माँगा 

आगे बढ़ता देख हमें वो फूला न समाया     

गलती करने पर हमे थप्पड़ भी लगाया 

जीवन रूपी भंवर में कैसे है तैरना 

ये मेरे गुरु ने मुझे सिखलाया

उसने ही राम मोहन राय विवेकानंद बनाए 

अब्दुल कलाम जैसे हीरे यहां उपजाए 

उसने ही पग पग हर बुराई से बचाया 

जीवन रूपी भंवर में कैसे है तैरना 

ये मेरे गुरु ने मुझे सिखलाया  

प्रथम गुरु माँ मेरी और मेरे गुरु हैं बहुतरे 

पिता पुत्र पति भाई बहन और मित्रगण मेरे

सब ने कुछ न कुछ मुझे सिखलाया 

जीवन रूपी भंवर में कैसे है तैरना 

ये मेरे गुरु  ने मुझे सिखलाया

जब भी पथ में मैं घबराया 

उसने ज्ञान प्रकाश फैलाया 

जीवन पथ पर सबल बनाया 

जीवन रूपी भंवर में कैसे है तैरना 

ये मेरे गुरु ने मुझे सिखलाया 

 

मौलिक व अप्रकाशित 

      

           . 

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Comment by Madhu Passi 'महक' on September 12, 2020 at 11:07am

आदरणीय आशीष यादव जी रचना पसंद आने के लिए बहुत बहुत आभार महोदय! 

Comment by आशीष यादव on September 10, 2020 at 10:42pm

गुरू को मान देती एक अच्छी रचना का प्रयास। बधाई स्वीकार कीजिये। 

Comment by Madhu Passi 'महक' on September 8, 2020 at 12:43pm

आदरणीया डिम्पल शर्मा जी सादर नमस्कार! रचना पर आपकी उपस्थिति और प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत बहुत आभार। 

Comment by Madhu Passi 'महक' on September 8, 2020 at 12:36pm

समर कबीर जी आदाब! आपकी हौंसला अफ़ज़ाई के लिए तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

Comment by Samar kabeer on September 7, 2020 at 7:54pm

मुहतरमा मधु जी आदाब, अच्छी रचना हुई है ,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Dimple Sharma on September 6, 2020 at 2:56pm

आदरणीया मधु जी नमस्ते, खुबसूरत रचना पर बधाई स्वीकार करें आदरणीया।

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