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ग़ज़ल (और कितनी देर तक सोयेंगें हम)

पल सुनहरी सुबह के खोयेंगें हम
और कितनी देर तक सोयेंगें हम।

रात काली तो कभी की जा चुकी
अब अँधेरा कब तलक ढोयेंगे हम।

जुगनुओं जैसा चमकना सीख लें 
रोशनी के बीज फिर बोयेंगे हम।

बीत जाता है समय जैसा भी हो
क्यों हँसेंगे और क्यों रोयेंगें हम।

आदतें अहसां-फरामोशी की हैं
चाँदनी को धूप से धोयेंगें हम।

काम बचपन में किये जो फिर करें
क्या कभी इतने बड़े होयेंगें हम।

#मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on September 20, 2020 at 5:34pm

रचना जी, आपका आभार कि आपने सुझाव प्रस्तुत किया। विचार अवश्य करूँगा।

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on September 20, 2020 at 5:33pm

जनाब रफ़ीक़ साहब बहुत बहुत आभार

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on September 20, 2020 at 5:33pm

आदरणीय चेतन जी, रचना की प्रशंसा के लिए आभार।

ग़ज़ल में रदीफ़ येंगें हम है

और क़ाफ़िया "ओ है।

Comment by Rachna Bhatia on September 20, 2020 at 3:34pm

आदरणीय अजय गुप्ता जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई बधाई स्वीकार करें।

मुझे "जुगनुओं जैसा सीख लें" में सीख "कर"

अधिक अच्छा लगा। सादर।

Comment by Rafique Nagori on September 20, 2020 at 3:15pm

जनाब अजय गुप्ता साहब ,आप की ग़ज़ल अच्छी लगी । मुबारक बाद कबूल कीजिए ।

Comment by Chetan Prakash on September 20, 2020 at 12:44pm

क्षमा करें, दोस्त क्या बता पाएंगे आपके रदीफ और काफिया क्मशः क्या हैं विषय-वस्तु यानि ( थीम्स ) अथवा सरोकार निश्चय ही प्रशंसनीय हैं।

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