For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल नूर की- जिन की ख़ातिर हम हुए मिस्मार; पागल हो गये

जिन की ख़ातिर हम हुए मिस्मार; पागल हो गये
उन से मिल कर यूँ लगा बेकार पागल हो गये.
.
सुन के उस इक शख्स की गुफ़्तार पागल हो गये
पागलों से लड़ने को तैयार पागल हो गये.
.
छोटे लोगों को बड़ों की सुहबतें आईं  न रास
ख़ुशबुएँ पाकर गुलों से ख़ार पागल हो गये.
.
थी दरस की आस दिल में तो भी कम पागल न थे
और जिस पल हो गया दीदार; पागल हो गये.
.
एक ही पागल था मेरे गाँव में पहले-पहल
रफ़्ता रफ़्ता हम सभी हुशियार पागल हो गये.
.
इल्तिजा थी सच को केवल सच के जितना ही लिखें
बात सुन कर शह्र के अख़बार पागल हो गये.
.
एक बच्चे ने कहीं राजा को नंगा कह दिया
फिर तो क्या दरबारी क्या अय्यार; पागल हो गये.
.
एक तुम हो एक मैं हूँ और दो दीवाने दिल
यानी इस कमरे में हम कुल चार पागल हो गये.
.
ज़िक्र आया ‘नूर’ का जब इक कहानी में कहीं
उस कहानी के सभी किरदार पागल हो गये.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1078

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 7:44am

धन्यवाद आ. सालिक गणवीर साहब

Comment by सालिक गणवीर on October 30, 2020 at 2:37pm

भाई निलेश ' नूर' जी
सादर अभिवादन
भाई क्या ग़ज़ल कही आपने,वाह। एक एक लफ्ज़ और हर एक अशआर के लिए तह -ए -दिल से दाद और मुबारक़बाद क़ुबूल करें।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 23, 2020 at 7:07am

शुक्रिया आ. सालिक गणवीर जी 

Comment by सालिक गणवीर on October 21, 2020 at 3:56pm

आदरणीय निलेश 'नूर' साहब
सादर अभिवादन
एक और शानदार ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें. सादर.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 20, 2020 at 6:54pm

शुक्रिया आ. लक्ष्मण धामी जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:44pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । अत्यधिक ध्यानाकर्षक व मनभावन गजल हुई है । कई बार पढ़ चुका पर मन भरा नहीं। इस उद्वेलित करती गजल के लिए ढेरों बधाइयाँ ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 20, 2020 at 7:56am

धन्यवाद आ. मीत जी,

मिस्मार का अर्थ है तहस नहस, छिन्न भिन्न

सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2020 at 12:45pm

धन्यवाद आ. योगराज सर..
एक मिरसा दिया गया था कभी मंच पर.."ख़ातिर से या लिहाज से मैं मान तो गया"..
आज आप ख़ातिर या लिहाज में ग़ज़ल तक आए तो दिल बाग़ बाग़ हो गया...
आप की टिप्पणी का हमेशा इंतज़ार रहता है.. लेकिन आपकी भी व्यस्तताएँ हैं..
(वैसे मैं भी कम ही समय दे पा रहा हूँ)
बहुत बहुत आभार 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2020 at 12:43pm

धन्यवाद आ. बसंत कुमार जी 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 16, 2020 at 12:40pm

बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है,


//इल्तिजा थी सच को केवल सच के जितना ही लिखें
बात सुन कर शह्र के अख़बार पागल हो गये.// चौथे खम्बे की चूलें हिला देने वाला शेअर है, वाह वाह वाह! 
.
//एक बच्चे ने कहीं राजा को नंगा कह दिया
फिर तो क्या दरबारी क्या अय्यार; पागल हो गये.// दो मिसरों में पूरी कहानी कह दी भाई. सानी में 'दरबारी' का हर्फ़ तो गिरा दिया गया है (जोकि जायज़ है), लेकिन शब्द का मानी बदल गया है. उम्मीद है आप नज्र-ए-सानी ज़रूर फरमाएंगे.


'//ज़िक्र आया ‘नूर’ का जब इक कहानी में कहीं
उस कहानी के सभी किरदार पागल हो गये.// यह जलवा हम लोग देहरादून में देख चुके हैं भाई.

बहुत ही तीखे तेवर में कही गई इस ग़ज़ल ने दिल जीत लिया भाई निलेश नूर जी. शेअर-दर-शेअर ढेरों-देर दाद और मुबारकबाद हाज़िर है.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

रामबली गुप्ता posted a blog post

कर्मवीर

आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं। स्थिति…See More
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर और समसामयिक नवगीत रचा है आपने। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
14 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
19 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

दोहा पंचक - आचरण

चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान। किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।। * हवा  विषैली  हो …See More
19 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई तिलक राज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार। 9, 10…"
19 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। कुछ मिसरे और समय चाहते है। इस प्रयास के…"
19 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। आ. भाई तिलक राज जी के सुझाव से यह और…"
20 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई अजय जी, प्रदत्त मिसरे पर गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। हार्दिक बधाई।"
20 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
" आदरणीय तिलक राज कपूर साहब,  आप मेरी प्रस्तुति तक आये, आपका आभारी हूँ।  // दीदावर का…"
yesterday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आ. भाई लक्ष्मण सिंह धानी ' मुसाफिर' साहब हौसला अफज़ाई के लिए  आपका बहुत-बहुत…"
yesterday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"आपने खत लिखा उसका ही असर है साईंछोड़ दी अब बुरी संगत की डगर है साईं धर्म के नाम बताया गया भाई…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187
"ग़ज़ल पर अपनी बारीक़-नज़र से टिप्पणी करने के लिए आपका आभार आदरणीय तिलकराज जी।  एक प्रश्न है: इस…"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service