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ग़ज़ल नूर की- जिन की ख़ातिर हम हुए मिस्मार; पागल हो गये

जिन की ख़ातिर हम हुए मिस्मार; पागल हो गये
उन से मिल कर यूँ लगा बेकार पागल हो गये.
.
सुन के उस इक शख्स की गुफ़्तार पागल हो गये
पागलों से लड़ने को तैयार पागल हो गये.
.
छोटे लोगों को बड़ों की सुहबतें आईं  न रास
ख़ुशबुएँ पाकर गुलों से ख़ार पागल हो गये.
.
थी दरस की आस दिल में तो भी कम पागल न थे
और जिस पल हो गया दीदार; पागल हो गये.
.
एक ही पागल था मेरे गाँव में पहले-पहल
रफ़्ता रफ़्ता हम सभी हुशियार पागल हो गये.
.
इल्तिजा थी सच को केवल सच के जितना ही लिखें
बात सुन कर शह्र के अख़बार पागल हो गये.
.
एक बच्चे ने कहीं राजा को नंगा कह दिया
फिर तो क्या दरबारी क्या अय्यार; पागल हो गये.
.
एक तुम हो एक मैं हूँ और दो दीवाने दिल
यानी इस कमरे में हम कुल चार पागल हो गये.
.
ज़िक्र आया ‘नूर’ का जब इक कहानी में कहीं
उस कहानी के सभी किरदार पागल हो गये.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 31, 2020 at 7:44am

धन्यवाद आ. सालिक गणवीर साहब

Comment by सालिक गणवीर on October 30, 2020 at 2:37pm

भाई निलेश ' नूर' जी
सादर अभिवादन
भाई क्या ग़ज़ल कही आपने,वाह। एक एक लफ्ज़ और हर एक अशआर के लिए तह -ए -दिल से दाद और मुबारक़बाद क़ुबूल करें।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 23, 2020 at 7:07am

शुक्रिया आ. सालिक गणवीर जी 

Comment by सालिक गणवीर on October 21, 2020 at 3:56pm

आदरणीय निलेश 'नूर' साहब
सादर अभिवादन
एक और शानदार ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें. सादर.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 20, 2020 at 6:54pm

शुक्रिया आ. लक्ष्मण धामी जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:44pm

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । अत्यधिक ध्यानाकर्षक व मनभावन गजल हुई है । कई बार पढ़ चुका पर मन भरा नहीं। इस उद्वेलित करती गजल के लिए ढेरों बधाइयाँ ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 20, 2020 at 7:56am

धन्यवाद आ. मीत जी,

मिस्मार का अर्थ है तहस नहस, छिन्न भिन्न

सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2020 at 12:45pm

धन्यवाद आ. योगराज सर..
एक मिरसा दिया गया था कभी मंच पर.."ख़ातिर से या लिहाज से मैं मान तो गया"..
आज आप ख़ातिर या लिहाज में ग़ज़ल तक आए तो दिल बाग़ बाग़ हो गया...
आप की टिप्पणी का हमेशा इंतज़ार रहता है.. लेकिन आपकी भी व्यस्तताएँ हैं..
(वैसे मैं भी कम ही समय दे पा रहा हूँ)
बहुत बहुत आभार 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 16, 2020 at 12:43pm

धन्यवाद आ. बसंत कुमार जी 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 16, 2020 at 12:40pm

बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है,


//इल्तिजा थी सच को केवल सच के जितना ही लिखें
बात सुन कर शह्र के अख़बार पागल हो गये.// चौथे खम्बे की चूलें हिला देने वाला शेअर है, वाह वाह वाह! 
.
//एक बच्चे ने कहीं राजा को नंगा कह दिया
फिर तो क्या दरबारी क्या अय्यार; पागल हो गये.// दो मिसरों में पूरी कहानी कह दी भाई. सानी में 'दरबारी' का हर्फ़ तो गिरा दिया गया है (जोकि जायज़ है), लेकिन शब्द का मानी बदल गया है. उम्मीद है आप नज्र-ए-सानी ज़रूर फरमाएंगे.


'//ज़िक्र आया ‘नूर’ का जब इक कहानी में कहीं
उस कहानी के सभी किरदार पागल हो गये.// यह जलवा हम लोग देहरादून में देख चुके हैं भाई.

बहुत ही तीखे तेवर में कही गई इस ग़ज़ल ने दिल जीत लिया भाई निलेश नूर जी. शेअर-दर-शेअर ढेरों-देर दाद और मुबारकबाद हाज़िर है.

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