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ग़ज़ल नूर की- ख़ूब इतराते हैं हम अपना ख़ज़ाना देख कर

ख़ूब इतराते हैं हम अपना ख़ज़ाना देख कर
आँसुओं पर तो कभी उन का मुहाना देख कर.
.

ग़ैब जब बख्शे ग़ज़ल तो बस यही कहता हूँ मैं  
अपनी बेटी दी है उसने और घराना देख कर. 
.

साँप डस ले या मिले सीढ़ी ये उस के हाथ है,
हम को आज़ादी नहीं चलने की ख़ाना देख कर.
.

इक तजल्ली यक-ब-यक दिल में मेरे भरती गयी
एक लौ का आँधियों से सर लड़ाना देख कर.
.

ऐसे तो आसान हूँ वैसे मगर मुश्किल भी हूँ
मूड कब कैसा रहे; तुम आज़माना देख कर. 
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 27, 2024 at 10:58pm

धन्यवाद आ. सालिक साहब

Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 1:22pm

आदरणीय भाई निलेश 'नूर' जी
आदाब
बहुत उम्दा ग़ज़ल के लिए दाद और मुबारक़बाद क़ुबूल कीजिये।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2020 at 11:56am

धन्यवाद आ. समर सर 

Comment by Samar kabeer on October 13, 2020 at 8:25pm

जनाब निलेश 'नूर' जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 7, 2020 at 8:56am

धन्यवाद आ. अजेय जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 7, 2020 at 8:56am

धन्यवाद आ. लक्ष्मण जी 

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on October 6, 2020 at 6:56pm

वाह नीलेश भाई वाह
हर शेर के बाद यक ब यक वाह वाह निकल उठा. बहुत उम्दा.
दूसरा शेर और तीसरा शेर तो बाकमाल, बेमिसाल. बहुत खूब

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 4, 2020 at 8:59am

आ. भाई नीलेश जी, सादर अभिवादन । बेहतरीन गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

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