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दोहा त्रयी : वृद्ध

दोहा त्रयी : वृद्ध


चुटकी भर सम्मान को, तरस गए हैं वृद्ध ।
धन-दौलत को लालची, नोचें बन कर गिद्ध । ।


लकड़ी की लाठी बनी, वृद्धों की सन्तान ।
धू-धू कर सब जल गए, जीवन के अरमान ।।


वृक्षहीन आँगन हुए, वृद्धहीन आवास ।
आशीषों की अब नहीं, रही किसी में प्यास ।।


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 717

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Comment by Sushil Sarna on March 8, 2021 at 6:37pm

आदरणीय नाथ सोनांचली जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।अवगत हुआ। हार्दिक आभार।

Comment by नाथ सोनांचली on March 7, 2021 at 8:18pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन

अच्छे दोहे सृजित किये हैं आपने,, गिद्ध और वृध्द की तुकांतता सहीह नहीं है। देखिएगा।। बधाई आपको 

Comment by Sushil Sarna on March 4, 2021 at 8:53pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार। जी, अवगत हुआ। हार्दिक आभार।

Comment by Samar kabeer on March 2, 2021 at 6:12pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, अच्छे दोहे लिखे,बधाई स्वीकार करें ।

'चुटकी भर सम्मान को, तरस गए हैं वृद्ध । 
धन-दौलत को लालची, नोचें बन कर गिद्ध 

इस दोहे में 'वृद्ध' और 'गिद्ध' की

तुकांतता पर विचार करें ।

Comment by Sushil Sarna on February 25, 2021 at 8:48pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2021 at 5:56am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । उत्तम दोहे हुए हैं हार्दिक बधाई ।

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