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गजल - जा तुझे इश्क हो // -- सौरभ

२१२ २१२ २१२ २१२ 
 
पुतलियों ने कहा, जा तुझे इश्क हो
फागुनी है हवा, जा तुझे इश्क हो
 
हैं कई मायने रंग औ’ गंध के
गर नहीं ये पता, जा तुझे इश्क हो
 
चुन रहे थे सदा कौडियाँ, शंख-सीप
फिर समुंदर हँसा, ’जा तुझे इश्क हो’
 
चैत्र-बैसाख की थिर-मदिर साँझ में
टेरती है हवा.. ’जा तुझे इश्क हो’
 
देख कर ये गगन गेरुआ-गेरुआ
गा उठी है धरा, जा तुझे इश्क हो
 
उपनिषद गा रहे सुन सखे, बावरे,
एक ही फलसफा --जा तुझे इश्क हो !
 
दे किताबें मुझे जो मुहब्बत पढ़ें,
या रहूँ अनपढ़ा, जा तुझे इश्क हो
 
जिंदगी बस नहीं निरगुनी धुन-लगन
ले गुलाबी दुआ, जा तुझे इश्क हो
****
सौरभ 
(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 26, 2025 at 11:43am

क्या अंदाज है ! क्या मिजाज हैं !

आपकी शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय नीलेश भाई. 

शुभ-शुभ

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2025 at 7:14pm

आ. सौरभ सर 
श्राप है या दुआ जा तुझे इश्क़ हो 
मुझ को तो हो गया जा तुझे इश्क़ हो.
.
इस ग़ज़ल के लिए विशेष बधाई  


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 30, 2022 at 12:21pm

आदरणीय दण्डपाणि नाहक जी, आपको प्रस्तुति अच्छी लगी इस हेतु धन्यवाद. 

अनपढ़ा शब्द न होता कैसे प्रयुक्त होता ? किंतु, कृपया आप यह भी देखें कि इसका किस तरह से व्यवहार हुआ है.

अनपढ़ और अनपढ़ा के महीन फर्क का आपकी सुधी दृष्टि भान कर सकेगी, इसकी हमें भी अवश्य अपेक्षा है. 
अन्यथा हम सहज ही उक्त मिसरे को कुछ यों लिख सकते थे -  या मैं अनपढ़ भला, जा तुझे इश्क हो  ... 

शुभातिशुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 30, 2022 at 12:14pm

आदरणीया अनिता जी, आपका हार्दिक धन्यवाद. 

Comment by Anita Maurya on March 29, 2022 at 7:22pm

वाह , क्या खूब ग़ज़ल हुई

Comment by Chetan Prakash on March 23, 2022 at 10:47am

आ. आपने सही कहा, परन्तु टंकण त्रुटि हुई ! 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 22, 2022 at 9:18pm

बहर-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम. आदरणीय चेतन प्रकाशजी, यह है बहर का दुरुस्त नाम. 

आपसे मिली प्रशंसा हेतु हार्दिक धन्यवाद.

Comment by Chetan Prakash on March 22, 2022 at 5:08pm

आ. सौरभ साहब,  बह्रे  मुताबिक मुसम्मन  सालिम में खुबसूरत  ग़ज़ल कही आपने । हाँ, शे'र  न0.7 दो मुँहा  जान पड़ा ! सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 22, 2022 at 2:55pm

आदरणीय सुशील सरनाजी, आपकी गुणग्राहकता के प्रति आभार. 

जय-जय 

Comment by Sushil Sarna on March 21, 2022 at 1:10pm
वाहहहहहह आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी बहुत ही खूबसूरत गजल बनी है । शे'र दर शे'र दाद कबूल फरमाएं सर । सादर नमन

कृपया ध्यान दे...

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