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कभी तो पढ़ेगा वो संसार घर हैं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२/१२२/१२२/१२२
*
सियासत को आता है तलवार पढ़ना
उसे भी सिखाओ तनिक प्यार पढ़ना।।
*
किसी दिन सभी कुछ यहाँ फूक देगा
सिखाओ न अब तुम ये अंगार पढ़ना।।
*
वही झूठ हर  दिन  वही  दुख भरा है
सुखद कब लगेगा ये अखबार पढ़ना।।
*
शिखर खोजते है बहुत लोग लेकिन
किसी को न भाता है  आधार पढ़ना।।
*
कभी  तो  पढ़ेगा  वो  संसार  घर हैं
जिसे आ गया घर को संसार पढ़ना।।
*
जमाने को अच्छा अगर कर न पाये
समझ लो हुआ सबका बेकार पढ़ना।।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

Views: 624

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 21, 2022 at 3:17am

आ. भाई बृजेश जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 10, 2022 at 6:05pm

बढ़िया बहुत बढ़िया आदरणीय धामी जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2022 at 6:45am

आ. भाई इन्द्रविद्यावाचस्पति जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by indravidyavachaspatitiwari on July 3, 2022 at 4:55am
जमाने को अच्छा अगर कर न पाये, ग़ज़ल के लिए धन्यवाद।करता कहना।काश सभी ऐसा सोचते?
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2022 at 8:05pm

आ. भाई गुमनाम जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 1, 2022 at 1:53pm

वाह मुसाफिर साहब खूब गजल हुई है । बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 1, 2022 at 11:00am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन।गजल पर उपस्थिति, प्रशंसा व स्नेह के लिए आभार। टंकण त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद।

Comment by Chetan Prakash on July 1, 2022 at 9:40am

मुतदारिक मुसम्मन सालिम  न कि जैसा  कि की बोर्ड की शरारत  से लिखा गया  है, आदरणीय   !

Comment by Chetan Prakash on July 1, 2022 at 9:37am

आदाब,  जनाब,  'मुसाफिर' साहब  मुताबिक मुसाफिर सालिम  ( 122   122   122   122 ) मे अच्छी गज़ल हुई  । सही शब्द  "फूँक  है, आप  चन्द्र बिन्दु लगाना भूल गये  !

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