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ईश करूं नित वंदना, रहो सदा हिय-धाम।
कलुष-भेद उर-तम मिटा, सफल करो सब काम।।1।।

सदा वास उर में करो, करुणानिधि जगदीश।
करूं जोर कर वंदना, धरो कृपा-कर शीश।।2।।

पार करो भवसिंधु से, बन तरणी-पतवार।
तुम बिन कौन सहाय अब, हे! जग-पालनहार।।3।।

हरि! हर लो हर भेद-तम, द्वेष-दंभ-दुर्भाव।
उर में नित सत-स्नेह के, भर दो निर्मल भाव।।4।।

सूर्य-चंद्र-भू-व्योम-जल, अनल--अनिल तनु-श्यान।
सिंधु-शैल-सरि सृष्टि के, कण-कण में भगवान।।5।।

कृपा-सिंधु कर के कृपा, भक्ति-भाव दो दान।
छवि-पावन तेरी प्रभो! रहे सदा मम ध्यान।।6।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by रामबली गुप्ता on July 19, 2016 at 9:50pm
आद0 अशोक रक्ताले जी प्रस्तुति में निहित भावों को मान देने के लिए हृदय से आभार। आपका सुझाव सर्वथा उचित है।
Comment by रामबली गुप्ता on July 19, 2016 at 9:48pm
आद0 समर कबीर जी रचना पर प्रोत्साहन के लिए हृदय से धन्यवाद।
Comment by Ashok Kumar Raktale on July 18, 2016 at 8:18am

आदरणीय रामबली गुप्ता जी सादर, बहुत सुंदर दोहे रचे हैं. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें.अंतिम दोहे में देख लें तीसरे चरण को क्या इस तरह होना था. /छवि पावन प्रभु आपकी /

Comment by Samar kabeer on July 16, 2016 at 10:29pm
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,अच्छे दोहे लिखे आपने इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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