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"जब तुम्हारें शह्र में आना हुआ"

2122 2122 212

इस कदर था इश्क़ में डूबा हुआ।
चढ़ गया सूली पे वो हँसता हुआ।।

अब कहूँ क्या इश्क़ में क्या क्या हुआ।
हर कदम पर इक नया धोखा हुआ।।

जब किसी को इश्क़ में धोखा हुआ।
फिर उसे देखा नहीं हँसता हुआ।।

क्या बताऊँ मैं तुझे क्या क्या हुआ।
है मेरा जीवन बहुत उलझा हुआ।।

और कुछ तेरे सिवा दिखता नहीं।
इस कदर मैं तेरा दीवाना हुआ।।

मानता कब है किसी की बात वो।
वक़्त जिसका हो बुरा आया हुआ।।

जख़्म दिल के फिर हरे होने लगें।
जब तुम्हारे शह्र में आना हुुुआ ।।

मौलिक व अप्रकाशित।

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Comment by surender insan on January 30, 2020 at 8:00pm

जी बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर साहब। सादर नमन।

Comment by Samar kabeer on September 23, 2019 at 2:49pm

जनाब सुरेन्द्र इंसान जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई,बधाई स्वीकार करें ।

किस कदर था इश्क़ में डूबा हुआ

वो जो सूली चढ़ गया हँसता हुआ'

इस मतले को यूँ कर लें:-

इस कदर था इश्क़ में डूबा हुआ

चढ़ गया सूली प वो हँसता हुआ'

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