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सदमे में है बेटियाँ चुप बैठे हैं बाप - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

आदम युग से आज तक, नर बदला क्या खास
बुझी  वासना  की  नहीं, जीवन  पीकर  प्यास।१।


जिसको होना राम था, कीचक बन तैयार
पन्जों से उसके भला, बचे कहाँ तक नार।२।


तन से बढ़कर हो गयी, इस युग मन की भूख
हुए  सभ्य  जन  भेड़िए, बिसरा  सभी  रसूख।३।


तन पर मन की भूख जब, होकर चले सवार
करती है वो  नार  की, नित्य  लाज  पर वार।४।


बेटी गुमसुम सोच ये, कैसा सभ्य विकास
हरमों से बाहर निकल, रेप आ गया पास।५।


सदमे  में  है  बेटियाँ, चुप  बैठे  हैं  बाप
नहीं बोलती रेप पर, लड़ने वाली खाप।६।


पहुँचे नीली  फिल्म  तक, जब  बेटों के हाथ
क्या क्या होगा फिर घटित, सोचो बेटी साथ।७।


रेपिस्टों को  झट  यहाँ, फाँसी  देगा  कौन
सन्सद में इस बात पर, क्यों छाया है मौन।८।


बलात्कार जो कर रहे, लड़ो न उनका केश
रहम करो अब तो तनिक, बेटी पर इस देश।९।


साथ करो सँस्कार की, घर समाज में बात
सुधरेंगे  तब  नार  के,  बदतर  जो  हालात।१०।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment

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Comment by Samar kabeer on December 9, 2019 at 3:45pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,अच्छे दोहे लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।

'आदम युग से आज तक, नर बदला क्या खास
बुझी  वासना  की  नहीं, जीवन  पीकर  प्यास'

आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि इस दोहे में 'ख़ास' और 'प्यास' की तुकांतता उचित नहीं है ।


'तन से बढ़कर हो गयी, इस युग मन की भूख
हुए  सभ्य  जन  भेड़िए, बिसरा  सभी  रसूख'

इस दोहे में भी 'भूख' और 'रसूख़' की तुकांतता उचित नहीं है,देखियेगा ।

'हरमों से बाहर निकल, रेप आ गया पास'

इस पंक्ति में 'हरमों' शब्द ग़लत है,'हरम' शब्द अरबी भाषा का है और इसका बहुवचन है "अहराम" ।

'रहम करो अब तो तनिक, बेटी पर इस देश'

इस पंक्ति में 'रहम' शब्द ग़लत है,सहीह शब्द है "रह्म" और इसकी मात्रा 21 है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 9, 2019 at 6:16am

आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 8, 2019 at 1:02am

आदरणीय लक्ष्मण सिंह धामी जी , इस गंभीर, सामयिक और शिक्षाप्रद प्रस्तुति के लिए बधाई , सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 7, 2019 at 6:08am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति से मान बढ़ाने.के लिए आभार ।

Comment by Sushil Sarna on December 5, 2019 at 7:23pm

आदम युग से आज तक, नर बदला क्या खास
बुझी वासना की नहीं, जीवन पीकर प्यास।१।


जिसको होना राम था, कीचक बन तैयार
पन्जों से उसके भला, बचे कहाँ तक नार।२।

वाह बहुत सुंदर आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ... क्या अहसास हैं ... खूबसूरत अशआर की ये ग़ज़ल काबिले तारीफ़ है। ..... दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर

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