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अपने हिसार-ए-फ़िक्र से बाहर बशर निकल (११७ )

(221 2121 1221 212 )
अपने हिसार-ए-फ़िक्र से बाहर बशर निकल
दुनिया बदल गई है तू भी अब ज़रा बदल
**
रफ़्तार अपनी वक़्त कभी थामता नहीं
अच्छा यही है वक़्त के माफ़िक तू दोस्त ढल
**
पीछे रहा तो होंगी न दुश्वारियां ये कम
चाहे तरक़्क़ी गर तो ज़माने के साथ चल
**
रिश्ते निभाने के लिए है सब्र लाज़मी
रखना तुझे है गाम हर एक अब सँभल सँभल
**
तूफ़ान में चराग़ की मानन्द क्यों जले
जलना ही गर तुझे है तो मानन्द-ए-मिह्र जल
**
लम्हात जो मिलें उन्हें भरपूर जी लें आप
वापस न लौटता है कभी कोई बीता पल
**
बेकार क्यों नुजूमियों के पास जा रहा
होनी जहाँ में आज तलक है रही अटल
**
क्यों रहगुज़ार-ए-जुर्म को चुनता है ऐ बशर
क्यों भूलता है इसका बुरा होगा यार फल
**
कल से जनाब आज का रिश्ता जुड़ा हुआ
जो आज है वही तो बनेगा 'तुरंत ' कल
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on Saturday

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सराहना के लिए सादर आभार एवं नमन | 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Saturday

आ. भाई गिरधारी सिह जी, सादर अभिवादन । सुन्दर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on Thursday

आपकी हौसला आफ़जाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया Dimple Sharma  जी  

Comment by Dimple Sharma on July 30, 2020 at 8:32am

आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत'तुरंत'जी नमस्ते, बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 29, 2020 at 11:23pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहेब आदाब | हौसला आफ़जाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया | 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 29, 2020 at 8:02pm

आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी 'तुरंत' आदाब, शानदार ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। मक़्ते पर हक़ीर राय पेश करना चाहता हूँ जनाब,

//कल से जनाब आज का रिश्ता जुड़ा हुआ

   जो आज है वही तो बनेगा 'तुरंत ' कल//

पहले मिसरे में 'है' की कमी महसूस हो रही है अगर मुनासिब लगे तो यूँ कर के देख सकते हैं :

"कल से जनाब आज का रिश्ता जुड़ा है यूँ 

  जैसा करोगे आज भरोगे 'तुरंत ' कल" 

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