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यार जब लौट के दर पे मेरे आया होगा

2122 1122 1122 22

***

यार जब लौट के दर पे मेरे आया होगा,
आख़िरी ज़ोर मुहब्बत ने लगाया होगा ।

याद कर कर के वो तोड़ी हुई क़समें अपनी,

आज अश्कों के समंदर में नहाया होगा ।

ज़िक्र जब मेरी ज़फ़ाओं का किया होगा कहीं,
ख़ुद को उस भीड़ में तन्हा ही तो पाया होगा ।

दर्द अपनी ही अना का भी सहा होगा बहुत,
फिर से जब दिल में नया बीज लगाया होगा ।

जब दिया आस का बुझने लगा होगा उसने,
फिर हवाओं को दुआओं से मनाया होगा ।

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Harash Mahajan on Wednesday

आदरणीय समर कबीर जी आपके कीमती वक़्त और मार्ग दर्शन की हमें हमेशा से दरकार रही है । आपकी की हुई तनक़ीद से बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है । बहुत बहुत शुक्रिया ।

सादर ।

Comment by Samar kabeer on Wednesday

मेरे कहे को मान देने के लिए आपका धन्यवाद ।

Comment by Harash Mahajan on Wednesday

आदरणीय समर कबीर जी आदाब । इंगित शेर पर आपका मार्गदर्शन बहुत ही महत्वपूर्ण रहा ।


उचित यही लगा::

याद कर कर के वो तोड़ी हुई क़समें अपनी,

आज अश्कों के समंदर में नहाया होगा ।

इन्हीं मिसरों के साथ अंतिम रूप से पोस्ट करता हूँ ।

सादर ।

Comment by Samar kabeer on Wednesday

'याद क़समें न बिछुड़ने की वो आई होंगी,
फिर वो अश्क़ों के समंदर में नहाया होगा'

उचित लगे तो इस शैर को यूँ कर सकते हैं:-

'याद कर कर के वो तोड़ी हुई क़समें अपनी

आज अश्कों के समंदर में नहाया होगा'

Comment by Harash Mahajan on Wednesday

आदरणीय समर कबीर जी सादर अभिवादन । आपके स्नेह और मार्गदर्शन से बहुत कुछ मिला है सर ।

आपके अंकित शेर पर मुझे भी ऐसा लगा था पर आपने उस ओर इशारा किया तो अब ज़रूरी लगा ।

इस शेर पर एक कोशिश और की है ज़रा नज़रें इनायत कीजियेगा ।

सादर ।

याद क़समें न बिछुड़ने की वो आई होंगी,
फिर वो अश्क़ों के समंदर में नहाया होगा ।

Comment by Samar kabeer on Wednesday

बाक़ी अशआर अब ठीक हैं,लेकिन

'क़समें खाईं थीं बिछुड़ कर न वो रोयेगा कभी,
आज अश्क़ों के समंदर में नहाया होगा'

इस शैर के सानी मिसरे का ऊला से रब्त पैदा करने का प्रयास करें । 

Comment by Harash Mahajan on Monday

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपकी आमद और ग़ज़ल पर स्नेहिल प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत शुक्रिया ।

सादर ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Monday

आ. भाई हर्ष महाजन जी, सादर अभिवादन ।गजल का प्रयास अच्छा हुआ है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Harash Mahajan on Sunday

आदरणीय समर कबीर जी आदाब । ग़ज़ल पर अपनी बेशकीमती तनक़ीद के लिए दिल से शुक्रिया । इस नाचीज़ पर इतना वक़्त देने के लिए शुक्रगुज़ार हूँ । आपके सुझावों के बाद इस ग़ज़ल पर एक कोशिश और की है । आपकी इस्लाह  की मुन्तज़िर...

सादर

यार जब लौट के दर पे मेरे आया होगा,
आख़िरी ज़ोर मुहब्बत ने लगाया होगा ।

क़समें खाईं थीं बिछुड़ कर न वो रोयेगा कभी,
आज अश्क़ों के समंदर में नहाया होगा ।

ज़िक्र जब मेरी ज़फ़ाओं का किया होगा कहीं,
ख़ुद को उस भीड़ में तन्हा ही तो पाया होगा ।

दर्द अपनी ही अना का भी सहा होगा बहुत,
फिर से जब दिल में नया बीज लगाया होगा ।

जब दिया आस का बुझने लगा होगा उसने,
फिर हवाओं को दुआओं से मनाया होगा ।

Comment by Samar kabeer on Sunday

जनाब हर्ष महाजन जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'लौटकर शख्स मेरे दर पे यूँ आया होगा'

इस मिसरे का शिल्प कमज़ोर है,यूँ कह सकते हैं:-

'यार जब लौट के दर पर मेरे आया होगा'

'कस्में खाईं थीं बिछुड़ कर न कभी रोयेंगे,
आज अश्क़ों के समंदर में नहाया होगा'

इस शैर में शुतर गुरबा दोष है,ऊला में बहुवचन और सानी में एक वचन,देखियेगा ।

'हर तरफ ज़िक्र वफ़ाओं का किया होगा जहाँ,
ख़ुद को अब भीड़ में तन्हा ही तो पाया होगा'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है, देखियेगा ।

'दुश्मनी करके निभाना भी कोई खेल नहीं,
सींच कर दिल को नया बीज लगाया होगा'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं हुआ, देखियेगा ।

'जब दिया आस का बुझता हुआ देखा उसने,
फिर हवाओं को दुआओं से मनाया होगा'

इस शैर पर जनाब अमीर जी से सहमत हूँ ।

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