For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल: मुराद ये नहीं हमको किसी से डरना है

1212 1122 1212 22/112


मुराद ये नहीं हमको किसी से डरना है
मगर सँभल के रह-ए-ज़ीस्त से गुज़रना है

मैं देखता हूँ तुझे भी वो सब दिखाई दे
मुझे कभी न कोई ऐसा शग्ल करना है

नज़ारा कोई दिखा दे ये शब तो वक्त कटे
इसी के साथ सहर होने तक ठहरना है

न जाने कितने मराहिल हैं ज़ह'न में मेरे
कोई ये काश बता दे कहाँ उतरना है

ये दिल भी देखता है बारहा वही सपने
ज़मीं पे आके बिल-आखिर जिन्हें बिखरना है

उन्हें उजालों से तकलीफ़ होती है ऐ दोस्त
जिन्हें अँधेरों से अपना जहान भरना है

उन्हें चमन से न फूलों से है कोई रग़बत
मगर मुझे यूँ न सहराओं में विचरना है

- मौलिक, अप्रकाशित

Views: 232

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 20, 2025 at 9:24pm

आ. भाई शिज्जू 'शकूर' जी, सादर अभिवादन। खूबसूरत गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Ravi Shukla on May 15, 2025 at 4:25pm

आदरणीय शिज्जु भाई ग़ज़ल की उम्दा पेशकश के लिये आपको मुबारक बाद  पेश करता हूँ । ग़ज़ल पर आाई टिप्प्णियों से लाभान्वित हो रहा हूँ । 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 5, 2025 at 12:01pm

आदरणीय भाई शिज्जु 'शकूर' जी इस खूबसूरत ग़ज़ल से रु-ब-रु करवाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।  ​


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 4, 2025 at 11:31am

आदरणीय सुशील सरना जी उत्सावर्धक शब्दों के लिए आपका बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 4, 2025 at 11:30am

आदरणीय निलेश भाई,
ग़ज़ल को समय देने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। आपके फोन का इंतज़ार है।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 4, 2025 at 11:29am

मोहतरम अमीरुद्दीन अमीर 'बागपतवी' साहिब बहुत शुक्रिया। उस शे'र में 'उतरना' शब्द ख़ास मक़सद से लिया था। बहरहाल, तरमीम कर लिया है, गौर फरमाइएगा‌
//न जाने कितने मराहिल हैं ज़ह'न में मेरे
मैं उलझनों में हूँ मुझको कहाँ ठहरना है//

/उन्हें उजालों से तकलीफ़ हो रही होगी/
सुझाव अच्छा है, मगर माजरत चाहूँगा। यहाँ आपका ख़याल कारण और परिणाम की ओर इशारा कर रहा है और मैं मानसिकता पर बात कर रहा हूँ, इसलिए मैं यहाँ तरमीम नहीं कर रहा। अलबत्ता आपका सुझाव संभालकर रख रहा हूँ। आगे अवश्य काम आएगा।

/मगर किसी का यहाँ इंतज़ार करना है/
आपका सुझाव अच्छा है, शुक्रिया। मगर माजरत चाहूँगा, यहाँ भी आपके और मेरे ख़याल मुख़्तलिफ़ हैं। यहाँ भी मैंने मानसिकता और दृष्टिकोण की बात की है। इसलिए शे'र में आदरणीय सौरभ सर के सुझावानुसार थोड़ा बदलाव किया है।
/उन्हें चमन से न फूलों से है कोई रग़बत
मगर मुझे न यूँ सहराओं में विचरना है/


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 4, 2025 at 11:26am

आदरणीय सौरभ सर,
ग़ज़ल पर विस्तृत टिप्पणी एवं सुझावों के लिए हार्दिक आभार। आपकी प्रतिक्रिया हमेशा उत्साहित करती है। आपने जिस मिसरे को रेखांकित किया है, उसे यूँ बदला है।
//न जाने कितने मराहिल हैं ज़ह'न में मेरे
मैं उलझनों में हूँ मुझको कहाँ ठहरना है//

मुझे लग रहा है कि उतरना शब्द के कारण कन्फ़्यूज़न की स्थिति बनी, उसका उपयोग एक खास कारण से किया था, मगर बताना पढ़ रहा है तो मैं मानता हूँ कि शे'र कमज़ोर है। दूसरा मिसरा आपके सुझाव के अनुरूप बदल लिया है।
उन्हें चमन से न फूलों से है कोई रग़बत
मगर मुझे न यूँ सहराओं में विचरना है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 4, 2025 at 11:25am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, ग़ज़ल को समय देने एवं उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 3, 2025 at 6:53pm

आदरणीय सौरभ सर, मैं इस क़ाबिल तो नहीं... ये आपकी ज़र्रा नवाज़ी है। सादर। 

Comment by Sushil Sarna on May 3, 2025 at 6:25pm

आदरणीय जी  इस दिलकश ग़ज़ल के लिए दिल से मुबारकबाद सर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"गजल*****करता है कौन दिल से भला दिल की बात अबबनती कहाँ है दिल की दवा दिल की बात अब।१।*इक दौर वो…"
6 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"सादर अभिवादन।"
6 hours ago
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"स्वागतम"
12 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार, रास्तो पर तीरगी...ये वही रास्ते हैं जिन…"
20 hours ago
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Tuesday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
Tuesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
Tuesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Feb 7
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service