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2122 2122 2122 2122

बत्तियाँ सारी बुझा कर द्वार पर साँकल चढ़ा कर
मस्त वो अपनी ही धुन में मुझको मुझसे ही चुरा कर

साँस हर मदहोश करती हाथ में खुशबू बची बस
फूल सब मुरझा चुके हैं राह में काँटे बिछा कर

क्या उसे एहसास भी है उस सुलगती सी तपिश का
जिस सुलगती राख में वो चल दिया मुझको दबा कर

सींच कर अपने लहू से ख्वाब की मिट्टी पे मिलजुल
जो लिखी थी दास्तां वो क्यों गया उसको मिटा कर

मेरी पलकों पर सजाए उसने ही सपने सुनहरे
जब कहा क्या सच करें? वो हँस दिया मुझको रुला कर

चूम ले वो आसमाँ ये ही दुआ माँगी हमेशा
क्या पता था यों उड़ेगा घोंसला अपना भुला कर ?

चाहे अब जितना पुकारूँ वो न मुझको सुन सकेगा
व्यर्थ अब करना प्रतीक्षा आस का दीपक जला कर

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on February 7, 2016 at 12:05pm

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ प्राची सिंह जी!बेहतरीन गज़ल!

Comment by मनोज अहसास on February 7, 2016 at 10:20am
बेहद खूबसूरत इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई
आदरणीया
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 6, 2016 at 11:44pm

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी, बहुत सुन्दर प्रस्तुति हुई है. इस बेहतरीन ग़ज़ल पर हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर.

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