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ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

थोड़ा आगे आने दो ,
मौक़ा उनको पाने दो ।


देखो, भटके फिरते हैं ,
उनको भी समझाने दो ।


कब तक सहना पाबंदी ,
दौर नया दिखलाने दो ।


सबको राहत मिल जाये ,
मौसम ऐसा आने दो ।


फिक्र करो मत दुनिया की ,
छोड़ो यारो जाने दो ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mohammed Arif on March 8, 2017 at 10:08am
बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय नीलेश साहब ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on March 8, 2017 at 8:06am

बहुत खूब ..अच्छी ग़ज़ल के लिये बधाई 

Comment by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 10:34pm
आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी हौसला अफज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया । उला मिसरे में सुधार कर लिया है ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 7, 2017 at 8:32pm

मुहतरम जनाब आरिफ़ साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है , शेर दर शेर दाद के साथ
मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ---शेर 5 के उला मिसरे को एक बार देख लीजिएगा

Comment by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 7:45pm
हौसला अफज़ाई के लिए हार्दिक आभार आदरणीय आशुतोष मिश्रा जी ।
Comment by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 7:43pm
बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सुशील सरना जी ।
Comment by Sushil Sarna on March 7, 2017 at 7:29pm

सबको राहत मिल जाये ,
मौसम ऐसा आने दो ।

मनभावन अहसासों के अशआर की ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 7, 2017 at 7:13pm
आदरणीय आरिफ जी छोटी बहर में बढ़िया ग़ज़ल हुयी है इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर
Comment by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 5:24pm
बहुत-बहुत शुक्रिया आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब । मिसरे को सुधारने का प्रयास कर रहा हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 5:21pm
बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सुरेन्द्र नाथ जी ।

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