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वादे इरादे (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (46)

दस साल बाद एक समारोह में उन दोनों की अप्रत्याशित मुलाक़ात हो गई। न चाहते हुए भी बात चल पड़ी।

"मैंने तुमसे वादा किया था कि मैं आई.ए.एस. अधिकारी बनकर दिखाऊंगा, मैंने पाँच साल ख़ूब मेहनत की, साक्षात्कार तक पहुंच जाता था लेकिन नसीब में तो प्रोफेसर बनना ही लिखा था !"

"मेरे परिवार के स्टेटस का सवाल था। हमारे यहाँ कोई भी रिश्ता प्रशासनिक सेवा से नीचे के लोगों में नहीं हुआ ! आई.ए.एस. बनने के बाद मैं अपने माँ-बाप को और ज़्यादा इंतज़ार नहीं करा सकती थी ! .... लेेेेकिन तुमने तो पागलपन की हद कर दी ! तुमने अब तक शादी क्यों नहीं की ! मैंने कोई तुम्हीं से विवाह करने का वादा तो किया न था, वो तो मैं तुम्हारी अद्भुत प्रतिभा से प्रभावित मात्र थी !"

"और मैंने उसे प्यार समझ लिया था !"

"वह तुम्हारी मूर्खता ही थी ! कुछ भी सोचने से पहले तुम्हें अपने माँ-बाप का लेवल तो देखना था ! मैंने अपने माँ-बाप से किये वादे के मुताबिक आई.ए.एस. बनने के बाद एक आई.ए.एस. से ही शादी की । वादे निभाना हर एक के बस की बात नहीं !

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Nita Kasar on December 23, 2015 at 7:22pm
अंजलि में भर कर वादे को जो फूँक मार कर उड़ा दे उसे बेवफ़ा कहते है तब वक़्त की धूल भी मलहम का कार्य नही कर सकती ।वादे के भरभराते भरोसे पर सटीक कथा लिखी है बधाई आपको आद०शहजाद जी ।
Comment by Rahila on December 23, 2015 at 12:04pm
बहुत खूब, "वादे निभाना हर किसी के बस की बात नहीं होती"बेहतर सोच, और सार्थक संदेश,बहुत बधाई आपको इस रचना हेतु । सादर

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