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धारावाहिक कहानी :- मिशन इज ओवर (अंक-5--------अंतिम अंक )

मिशन इज ओवर (कहानी )

लेखक -- सतीश मापतपुरी

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अंक - 5 (अंतिम अंक )

डॉक्टर सुनीता के आ जाने से संस्था पहले से अधिक सार्थक एवं सकारात्मक ढंग से काम करने लगी और परिणाम भी नज़र आने लगा I रामलाल को अपनी भूल का एहसास हुआ और वह अपने छोटे भाई श्यामलाल को ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर ले गया I रामलाल को ऐसा करते देख कई लोग अपने परिजनों को अपने साथ ले गए I एड्स के साथ जी रहे लोगों के पुर्नवास की दिशा में संस्था के बढ़ते कदम से रहमत अली गद्गद थे I

           विकास अब संस्था के काम में पहले की तरह सक्रिय नहीं हो पा रहा था, तुरंत उसे थकान महसूस होने लगती थी I रहमत अली से अब और अपनी बीमारी छिपाना उसे उचित नहीं लगा I जब विकास रहमत अली को अपनी बीमारी के बारे में बताया तो वह सन्न रह गए, कुछ पल हा किये फटी-फटी नज़रों से वह विकास को देखते रहे I विकास के लाख मना करने के बावजूद रहमत अली उसे डाँ.सुनीता के पास ले गए I विकास को बाहर बिठा कर रहमत अली अकेले ही सुनीता से मिलकर उसे विकास के बारे में बताया I विकास की बीमारी की बात सुनकर सुनीता को महसूस हुआ कि उसके कानों के पास बम सदृश धमाका हुआ है, वह बेजान पावों पर उठ खड़ी हुयी और बिना कुछ बोले अंदर चली गयी I सुनीता का यह रवैया रहमत अली को नागवार लगा I जब सुनीता वापस लौटी तो उसकी आँखें छोटी और लाल थीं I सुनीता के इशारे पर रहमत अली विकास को उसके पास ले आया,सुनीता पलकें उठाकर विकास को देखा-यह क्या ?...........उसकी बोलती आँखें खामोश हो चुकीं थीं और उसने दूसरे ही पल पलकें झुका ली I डाँ.सुनीता ने विकास का कई तरह से चेकअप किया I रहमत अली की नज़रें सुनीता के चेहरे पर ही टिकी हुयी थीं और चेकअप के दौरान सुनीता के चेहरे पर आ-जा रहे भाव को देखकर रहमत का दिल बैठा जा रहा था I चेकअप करने के बाद सुनीता कुछ पल के लिए खामोश हो गयी, उसकी आँखें भर चुकी थीं I............. क्षीण आवाज में सुनीता ने विकास से कहा- 'योर मिशन  इज ओवर ' और फिर वह झटके से उठकर भीतर चली गयी I

                                                               समाप्त

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Comment

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Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 5, 2011 at 11:30pm

बहुत अच्छी कहानी लिखी आपने !बहुत बहुत बधाई आपको !  किसी भी परिस्थिति में इंसान को हार नहीं माननी चाहिए विकट से विकट स्थिति में भी इंसान को जीने के लिए कोई न कोई मिशन मिल ही जाता है ! :-)

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on August 17, 2011 at 12:19pm

waise kuchh bhi ho aapki kahani ka kathanak bahut hi khubsoorat aur jordaar hai ........bahut bahut badhai 

           aids jaise bhayanak bimari pe aapke dwara rachit kahani ko padkar achha laga ....ek baar punah badhai.....

Comment by satish mapatpuri on August 17, 2011 at 11:38am
सराहना के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद गणेशजी. आपने टिपण्णी के क्रम में जो भी सुझाव दिया है वह निःसंदेह मान्य है.  

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 17, 2011 at 10:04am

सतीश भईया, आज जो मैंने आपकी प्रस्तुत कहानी अंक १ से पढ़ना प्रारंभ किया तो मिशन इज ओवर कर के ही दम लिया, कहानी सधी और कथ्य जोरदार लगा, कहानी को और विस्तृत किया जा सकता है, नायक को एड्स रोग लगने के कारण को भी बताया जा सकता है, नायक को ऍम ए का विद्यार्थी न कह कर मेडिकल स्टुडेंट बताया जाता तो नायक और सुनीता की दोस्ती प्राकृतिक लगती |

कुल मिलाकर एक खुबसूरत कहानी , ऐसा लगा की कोई टी वी सिरिअल देख रहे हो | बधाई आपको |

Comment by satish mapatpuri on August 16, 2011 at 12:40am

टिपण्णी के लिए धन्यवाद गुरूजी.

Comment by Rash Bihari Ravi on August 15, 2011 at 8:31pm

bhagwan aisa din kisi ko na dikhaye

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