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ग़ज़ल--बह्र फेलुन×5+फा

कुछ भूला कुछ पहचाना सा लगता है
कोई मुझको दीवाना सा लगता है ।

थोड़ी उलझन थोड़े आँसू जैसा वो
जीवन का ताना बाना सा लगता है ।

ग़ुरबत में देखा जो मुझको यारों ने
बोले कोई अंजाना सा लगता है ।

वक़्त बदलते देर नहीं लगती भाई
अपना होकर बेगाना सा लगता है ।

शाइर बनकर घूम रहा है देखो तो
'आरिफ़'कोई दीवाना सा लगता है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2017 at 6:34pm
आ. भाई आरिफ जी सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by Mohammed Arif on November 26, 2017 at 7:40pm
नज़रे इनायत का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय अफ़रोज़ सहर साहब ।
Comment by Afroz 'sahr' on November 26, 2017 at 1:57pm
जनाब आरिफ़ साहिब इस रचना पर बहुत बधाईआपको,,
Comment by Mohammed Arif on November 26, 2017 at 9:26am
दाद-ओ-तहसीन और नज़रे इनायत का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय शंकर जी ।
Comment by Kalipad Prasad Mandal on November 26, 2017 at 9:25am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है आ मोहम्मद आरिफ साहब | आदाब 

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 26, 2017 at 8:56am
सभी पांचो शेर बहुत सुन्दर , बधाई, आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी, सादर।
Comment by Mohammed Arif on November 25, 2017 at 2:36pm
दाद-ओ-तहसीन का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय निकोर जी ।
Comment by vijay nikore on November 25, 2017 at 8:15am

//वक़्त बदलते देर नहीं लगती भाई
अपना होकर बेगाना सा लगता है ।//

वाह ! बेहतरीन गज़ल के लिए दिल से बधाई, आरिफ़ भाई।

Comment by Mohammed Arif on November 25, 2017 at 7:48am
बहुत-बहुत आभार आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी ।
Comment by Mohammed Arif on November 25, 2017 at 7:47am
दाद-ओ-तहसीन का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीया रक्षिता जी ।

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