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डूब गया कल सूरज

डूब गया कल सूरज

कल ही तो था जो आई थी तुम

बारिश के मौसम की पहली सुगन्ध बनी

प्यार की नई सुबह बन कर आई थी तुम

मेरे आँगन में नई कली-सी मुस्कराई थी तुम

याद है मुझको वसन्त रजनी में

कल ही तो था जो करी थी आँखों से बातें

छलक-छलक रहा था प्राणों में प्यार

विकसित हुआ रोम-रोम में अनंत उल्लास 

परिपूर्ण हुई थी परस्पर कोई गहरी पहचान

सपने-सा लगा था मुझको वह बाहु-बन्धन

पुलकित था प्राणों का कण-कण

कि तुम्हारे पतले प्यारे ओठों का

खुमार भरी तुम्हारी उनींदी पलकों का

मुझको मधुरिम पहला प्यार मिला

कहा था तुमने, प्यार की कसम

प्यार में कभी न बदलोगी तुम

कल की बातें, वह कल की कसम

स्नेह की वह रजनीगंधा-सी सुगन्ध

कल की थी, कल ही के साथ गई

तिर आई है चुपके से

अचानक अनजाने उर की पीड़ा

मधु-पराग-सा कैसा

क्षणिक यह उल्लास था मेरा

मूक हुई मेरी वाणी की स्वर-धारा

जिन ओठों को सींचा था तुमने ओठों की सिहरन से

रह गए वह अब अवाक खुले के खुले

स्वाती की बूँद की आस लिए, ...  न आई वह बूँद

न उनको फिर तुम्हारी पलकों का प्यार मिला

पीड़ा से हुआ यह मेरा पहला परिचय

प्यार को कैसा यह कसकन का उपहार मिला

होती यदि तुम पास, प्रिय, तो पूछता मैं यह प्रश्न तुमसे

जाना था जल्दी तो इतनी उतावली पास आई ही क्यूँ

स्नेह की सोम्य छवि दिखा कर पलक झपकते ही 

प्यार पर मेरे अपने प्यार की मुहर लगाई क्यूँ ?

किरणों की किरणों से प्यार की बात

अब कल की पुरानी है फिर सही

किरणों को समेट कर दूर कहीं पर

डूब गया सूरज जाने किस भार से

प्यार की अब कोई नई सुबह न होगी

आँगन में होगी अब न कोई वासन्ती बयार

                    -------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on Monday

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, प्रिय मित्र लक्ष्मण जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Monday

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई । 

Comment by vijay nikore on Monday

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, प्रिय भाई समर कबीर जी।

Comment by Samar kabeer on Sunday

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब, हमेशा की तरह एक अच्छी रचना पेश की आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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