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ज़बान :

बड़ी अजीब है ये दुनिया 

जाने कितने ताले लगाए फिरती है 

अपनी ज़बान  पर 

खूनी मंज़र चुपचाप सह जाती है 

हकीकत  में किसी के पास 

वो ज़बान  ही नहीं 

जो सच को बयाँ कर सके 

इसीलिये अक्सर लोग 

रूहानी आवाज़ को 

अपने अंदर ही दफ़्न कर लेते हैं 

घोंट देते हैं अहसासों का गला 

और छटपटाने देते हैं 

वेदना की व्याकुलता को 

किसी परकटे पंछी की तरह 

अंदर ही अंदर 

रूहानी परतों के नीचे 

लेकिन

 कब तक कोई अपने 

अहसासों को दबाएगा 

भीतरी तहों की छटपटाहट 

तोड़ देती है मौन की हर चट्टान को 

और तरल हो जाती चीख 

आँखों की दीवारों पर 

कभी न कभी 

न चाहते हुए भी 

ताले टूट जाते हैं 

मौन के 

सुशील सरना 

मौलिक एवं अप्रकाशित  

Views: 354

Comment

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Comment by Samar kabeer on March 5, 2020 at 6:00pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2020 at 7:11am

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन । अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई ।

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