For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल (जो नज़र से पी रहे हैं )

212 /1212 /2

जो नज़र से पी रहे हैं

बस वही तो जी रहे हैं

ये हमारा रब्त देखो

बिन मिलाए पी रहे हैं

कोई रिन्द भी नहीं हम

बस ख़ुशी में पी रहे हैं

इक हमें नहीं मयस्सर

गो सभी तो पी रहे हैं

क्या पिलाएंगे हमें जो 

तिश्नगी में जी रहे हैं 

वो हमें भी तो पिला दें

जो बड़े सख़ी रहे हैं   

 

बेख़ुदी की ज़िन्दगी है 

बेख़ुदी में पी रहे हैं   

वो पिलाएंगे हमें भी

इस उमीद जी रहे हैं 

कोई लब रहे न प्यासा 

कह तो वो यही रहे हैं

ये 'अमीर' बेकसी हम

महवे - तिश्नगी रहे हैं

"मौलिक व अप्रकाशित" 

 

Views: 204

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 12, 2020 at 9:31pm

आदरणीय जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब आदाब ।

ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी इस्लाह और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया ।

"क्या पिलाएंगी हमें वो  * निग्हें जो झुकी हुई हैं" इस शेअ'र में ग़लती से रदीफ़ बदल गयी है, शेअ'र हटाने की सोच रहा हूँ। आपसे भी मदद की दरख़्वास्त है। 

/212 / 1212 / 2

वो पिलाएंगे हमें भी
इस उम्मीद जी रहे हैं/
जनाब-ए-आली, इस शे'र के सानी मिसरे में 'उम्मीद' को 'उमीद' (बिना तश्दीद के) लिखना मुनासिब होगा, इसे बह्र में रखने के लिए।

जी मैं आप से सहमत हूँ। मगर यहीं ओ बी ओ पर मेरे एक उस्ताद-दोस्त ने मेरी एक ग़ज़ल पर इस्लाह पर मुझे बताया था कि :

//जब आपके अश'आर की तक़ती'अ की जाएगी तो इन अल्फ़ाज़ को उस तरह से पढ़ा जाएगा जिस तरह आपने लिखा है, लेकिन हुज़ूर जब आप अपनी ग़ज़ल लिखित रूप में पेश करेंगे हैं तो उसमें साधारण हिज्जे ही लिखेंगे, जो आम लोग पढ़ सकें, और जिनमें से बहुत से ऐसे होंगे जिन्हें अरूज़ और तक़ती'अ की समझ नहीं होगी।//या फिर जैसा आप कहें। सादर। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 12, 2020 at 9:15pm

मुहतरम जनाब सालिक गणवीर जी, आदाब। ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया।

जी भूल हो गयी, सुधार करता हूँ या शेअ'र हटाता हूँ, कोई सुझाव हो तो फ़रमाएं। सादर। 

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 12, 2020 at 8:30pm

मुहतरम जनाब सालिक गणवीर जी, आदाब। ग़ज़ल पर आपकी हाज़िरी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया।

जी भूल हो गयी, सुधार करता हूँ या शेअ'र हटाता हूँ, कोई सुझाव हो तो फ़रमाएं। सादर। 

Comment by सालिक गणवीर on June 12, 2020 at 8:12pm

आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर' साहिब

आदाब

छोटी बह्र में बड़ी ग़ज़ल कही है आपने. मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें. शाहिद साहिब ने बता ही दिया है ,एक शैर में रदीफ़, 'रहे हैं' कि बजाय 'हुई हैं' ,हो गई है.

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on June 12, 2020 at 6:17pm

आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहिब, छोटी बह्र में शानदार ग़ज़ल कही आपने। कृपया दाद और बधाई स्वीकार करें। ग़ज़ल का मतला ख़ास तौर पर पसंद आया।

/212 / 1212 / 2

वो पिलाएंगे हमें भी
इस उम्मीद जी रहे हैं/
जनाब-ए-आली, इस शे'र के सानी मिसरे में 'उम्मीद' को 'उमीद' (बिना तश्दीद के) लिखना मुनासिब होगा, इसे बह्र में रखने के लिए।

/क्या पिलाएंगी हमें वो
निग्हें जो झुकी हुई हैं/
हुज़ूर, इस शे'र में रदीफ़ 'रहे हैं' से बदल कर 'हुई हैं' हो गई है।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on June 12, 2020 at 4:27pm

मुहतरमा डिम्पल शर्मा जी, आदाब।

ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और हौसला अफ़ज़ाई के लिये तहे-दिल से शुक्रिया ।

Comment by Dimple Sharma on June 12, 2020 at 3:59pm

आदाब मोहतरम , बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है , बधाई स्वीकार करें।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

बसंत कुमार शर्मा commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post उसको भाया भीड़ का होकर खो जाना -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्षण धामी जी सादर नमस्कार उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें. सादर."
3 minutes ago
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे - ग़ज़ल
"आदरणीय Rupam kumar -'मीत' जी सादर नमस्कार  आपकी हौसलाअफजाई के लिए दिल से…"
5 minutes ago
Anil Kumar Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"नीलेश जी , संभव न हो कि उस वक़्त सूझता न हो ! शेर को दुरुस्त करना कभी असंभव नहीं होता. मुझे भी पहले…"
7 minutes ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"धन्यवाद आ. समर सर वो पुछल्ला भी कि और की के फेर में रिजेक्ट कर दिया है सादर "
42 minutes ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"शुक्रिया आ. अनिल कुमार जी..तक़ाबुल ए रदीफ़ उस सूरत में स्वीकार्य है अगर मिसरा कहने की कोई कोई तरक़ीब…"
43 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"ये समर सर आपका आदेश था कि सुन ऐ "नूर"तेरी इस रचना में भी वो…"
55 minutes ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"जनसब निलेश 'नूर' जी आदाब, तरही मिसरे पर दिल ख़ुश कर देने वाली ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार…"
59 minutes ago
Anil Kumar Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"जनाब तस्दीक साहब तीसरे शेर में तकाबुल रदीफ़ हो रहा है .सादर "
1 hour ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब, उम्द: ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार करें ।"
1 hour ago
Anil Kumar Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"जनाब समर साहब शुक्रिया .इस्लाह का शुक्रिया .मुस्तबिद -  'किसी चीज़ पर अकेला हक़ जताने…"
1 hour ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"जनाब नाकाम साहिब आदाब, ग़ज़ल के प्रयास और आयोजन में शिर्कत के लिये धन्यवाद । आप सिर्फ़ अपनी ग़ज़ल पोस्ट…"
1 hour ago
Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार…"
1 hour ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service