For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

उम्र आधी कट गई है, उम्र आधी काट लूँगी

रात दिन तुमको पुकारा,

किन्तु तुम अब तक न आए !

चित्र मेरी कल्पना के,

मूर्तियों में ढल न पाए !

 

चिर प्रतीक्षित आस के संग, प्यार अपना बाँट लूँगी ।

उम्र आधी कट गई है, उम्र आधी काट लूँगी !!

 

प्रेम तुमसे ही तुम्हारा,

किस तरह आखिर छिपाऊँ ?

और कह भी दूँ, कहो यह,

रीत फिर कैसे निभाऊं ?

 

गूँजते हो धड़कनों की,

थाप पर अनुनाद बन कर !

मौन मन की सिहरनों में,

घुल चुके आह्लाद बन कर !

 

मंत्र की माला बना कर,

भाव तुमको जप रहे हैं ।

प्राण प्रस्पंदन कपूरी,

आँसुओं में तप रहे हैं ।

 

बांध में सागर बंधा है,

क्या पता कब टूट जाए !

लाँघ चौखट होंठ की ना ,

शब्द कोई फूट जाए !

 

तुम अगर हो दूर कह दो,

पास फिर किसको कहूँ मैं !

सत्य का प्रतिबिंब छल कर,

किस तरह जीवन सहूँ मैं !

 

ज़िन्दगी से मैं अधूरे ,

प्रेम का हर पल घटा कर !

अब प्रतीक्षरत सजे हर,

द्वार का तोरण हटा कर !

 

सौंप कर यह प्राण निश्छल,

सिर्फ इतना कह सकूँगी !

मैं तुम्हारी थी तुम्हारी,

हूँ तुम्हारी ही रहूँगी !

 

स्वप्न के आरोह में घुल, दूरियों को पाट लूँगी ।

उम्र आधी कट गई है, उम्र आधी काट लूँगी !!

 

मैं धुआँ हूँ ख्वाहिशों का,

बूँद में जो ढल न पाई !

ओस बन कर अर्चना की,

पाँखुरी में पल न पाई !

 

तुम बना पगडंडियाँ नव,

खोजते हो हर दिशा में !

मौन मन के क्रन्दनों को 

घोलते हो हर निशा में !

 

रूप का प्रारूप बुन कर,

ढालते हो कल्पना को !

और खुद रच कर मिटाते,

हो सृजक की अल्पना को !

 

मैं अनंतिम छोर मेरी,

पूर्णता केवल तुम्हीं हो !

आदि-मध्यम-अंत-गति का 

हर वलय प्रतिपल तुम्हीं हो !

 

मैं विलग तुमसे कहाँ हूँ,

तुम विलग मुझसे कहाँ हो ?

आत्म का प्रस्पंद बन कर,

मैं वहीँ हूँ तुम जहाँ हो ?

 

आँसुओं की लेखनी हूँ,

मैं नहीं पन्ना शपथ का !

मैं नहीं अनुबंध कोई !

रीतियों के तर्क पथ का,

 

वेदना की प्यास हूँ मैं ,

ज़िन्दगी में खो न पाई !

उफ़! नियति का लेख अपने,

आँसुओं से धो न पाई !

 

सर झुका कर नियति के इस पंथ से उच्चाट लूँगी ।  (उच्चाट= विरक्ति)

उम्र आधी कट गई है, उम्र आधी काट लूँगी !!

 

मूँद पलकें देखती हूँ ,

सिहरनों की कोर तक तुम !

हो तिमिर या रश्मियाँ हों ,

दृष्टि के उस छोर तक तुम !


तुम समाये हो सदा से ,

आर्द्र मन की प्रार्थना में !
प्राण प्रिय की कल्पन में
क्लांत मन की याचना में !

गूँजते थे बस तुम्हीं तुम ,

किन्तु तुम ही सुन न पाए !

आस में जलते नयन थे ,

किन्तु तुम ही चुन न पाए !

 

बोल दो क्या आ सकोगे,

सामने संलक्ष्य बन तुम ?

चीखती बेबस कराहों,

के अटल संरक्ष्य बन तुम ?

 

प्यास की इन रिक्तियों में,

रीतते हर पल क्षमा कर !

टूटती हर धारणा पर,

भीगते आँचल क्षमा कर !

 

मैं हृदय  में जल रही हर,

आस का दीपक बुझा कर !

आँख में पलते हुए हर,

स्वप्न के मोती गिरा कर !

 

नम प्रतीक्षारत क्षणों से,
चिर जुदाई ले चली हूँ !

मुक्तिपथ पर बन्धनों से
चिर विदाई ले चली हूँ !

 

सर्जना के मौन स्वर से, मैं नवल स्वर छाँट लूँगी ।

उम्र आधी कट गयी है, उम्र आधी काट लूँगी !!



मौलिक और अप्रकाशित

डॉ० प्राची सिंह
(थीम पंक्ति साभार ... डॉ० सुनील कुमार वर्मा सृजित)

Views: 91

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 9, 2020 at 7:54pm

भाई लक्ष्मण जी 

गीत पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 9, 2020 at 7:53pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी 
जो शब्द 'उम्र' आपको पुनरुक्ति के कारण खटक रहा है .... वो मुझे इस पंक्ति का काव्यात्मक सौन्दर्य प्रतीत हुआ , इसी वजह से मैंने किसी अन्य लेखक की इस थीम पंक्ति को आधार मान कर गीत सृजित किया है ..... ये मुख्य पंक्ति ही गीत का आधार है . जी साभार किसी अन्य रचनाकार की संपत्ति है 

सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 9, 2020 at 7:50pm

आदरणीय अखिलेश जी 
शुद्ध हिंदी के शब्दों में एक गीत तो क्या पूरा का पूरा महाकाव्य बहुत सहजता से हो सकता है...इसमें किसे संशय है, जिसे है वो अपना शब्दकोष दुरुस्त करे और यहीं मंच पर मेरी और अन्य रचनाकारों की कई कई अप्रतिम रचनाओं को पढ़े और यहाँ के आयोजनों के पन्नो पर ठहरे...
रही काव्य में अरबी फारसी के शब्दों की बात तो कुछ शब्द आम बोलचाल में इस तरह शामिल हो चुके हैं कि वो रगों में बहते हैं... उन्हें अलग कर कर के थक जाइएगा... कर नहीं पाइयेगा... और करना सही भी नहीं... इसी तरह सभ्यताएं अपनी संस्कृतिक वैविध्य को जीती हैं और एक्य भाव में अंतर्गुन्थित होती हैं...

कम से कम सहज गीतों में इस सहज प्रवाह को जीना मुझे बहुत सुखद लगता है

गीत तक आप पहुंचें आपका धन्यवाद आदरणीय 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on July 9, 2020 at 2:59pm

आदरणीया प्राचीजी

उम्र उफ खुद ख्वाहिशों जिन्दगी आदि शब्दों के स्थान पर हिन्दी के शब्द समायोजित हो सके तो कृपया अवश्य कीजिए। छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश से वाट्सएप में मुझसे जुड़े कवियों एवं विद्वानों के समूह को यह बतलाना चाहता हूँ कि अरबी फारसी शब्दों के बगैर भी एक लम्बी कविता लिखी जा सकती है। लोगों का कहना है कि 6- 8 - 10 पक्तियाँ तो लिख सकते हैं पर एक लम्बी कविता पूर्णतः हिन्दी में लिखना संभव नहीं।

मुझे विश्वास है कि कुछ संशोधन पश्चात यह रचना 100% हिन्दी में हो सकती है। आपके पास शब्दों का भंडार है इसलिए अर्थ भाव एवं गेयता की दृष्टि से कोई अंतर भी नहीं होगा। ....... इसी आशा के साथ ..... सादर।

इस सुंदर गीत के लिए हृदय से बधाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on July 9, 2020 at 10:13am

मुहतरमा डॉ० प्राची सिंह जी आदाब, सुन्दर एवं मनोहारी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें। 

"उम्र आधी कट गई है, उम्र आधी काट लूँगी"   यहांँ पर दो बार "उम्र" शब्द थोड़ा खटक रहा है, यदि उचित लगे तो इसे यूँ कर के देख सकते हैं :

"उम्र आधी कट गई है, और आधी काट लूँगी"  सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 9, 2020 at 9:38am

आ. प्राची बहन, सादर अभिवादन । अच्छा गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post गजल- कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तक
"आद0 रवि भसीन 'शाहिद' भाई जी सादर अभिवादन आपकी दाद पाकर प्रफुल्लित हूँ। शुक्रियः आपका। सादर"
2 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post गजल- कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तक
"आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहिब, आदाब! आपको इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर दिली…"
2 hours ago
Usha Awasthi posted a blog post

शिवत्व

जब मन वीणा के तारों पर स्वर शिवत्व झन्कार हुआचिरकालिक,शाश्वत ,असीमप्रकटा , अमृत संचार हुआनिर्गत हुए…See More
2 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' posted a blog post

गजल- कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तक

बह्र- 2122   1122   1122  112/22कोख में आने से साँसों के ठहर जाने तकज़िन्दगी में सकूँ मिलता नहीं मर…See More
3 hours ago
anjali gupta posted a blog post

ग़ज़ल

221 1221 1221 122शतरंज में रिश्तों की मैं हारा नहीं होता  अपनों को बचाने में जो उलझा नहीं होतायादें…See More
3 hours ago
आशीष यादव posted a blog post

उसने पी रखी है

2122 2122 2122 2122वो न बोलेगा हसद की बात उसने पी रखी है सिर्फ़ होगी प्यार की बरसात उसने पी रखी…See More
3 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (मौत की दस्तक है क्या...)
"मुहतरम जनाब रवि भसीन शाहिद साहिब आदाब।हक़ीर की ग़ज़ल पर आपकी आमद, सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के…"
16 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post झूलों पर भी रोक लगी -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी नमस्कार ।वर्तमान की मुख्य समस्या करोना पर एक प्रेयसी की…"
19 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post ग़ज़ल -दौर वह यारो गया और उसके दीवाने गए
"आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' सादर नमस्कार! आज की राजनीति पर कटाक्ष करती सुंदर…"
19 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on सालिक गणवीर's blog post लोग घर के हों या कि बाहर के...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)
"आदरणीय सालिक गणवीर जी सादर नमस्कार। बहुत ही भावपूर्ण व सुन्दर ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद।"
19 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post वो भी नहीं रही (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीया Madhu Passi 'महक' साहिबा, नमस्कार! आपकी नवाज़िश और प्रोत्साहन के लिए…"
21 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post वो भी नहीं रही (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी नमस्कार । ग़ज़ल बहुत अच्छी हुई है। हर शैर दिल को छू गया। इसके…"
23 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service