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काँटों से बिँध फूल को आते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२


शीशे को भी  रखने  वाले  पत्थर लोगों नहीं रहे
‌यौवन के अब पहले  जैसे  तेवर  लोगों नहीं रहे।१।
**
ढूँढा करते  हैं  गुलदस्ते  तितली  भौंरे  आज यहाँ
‌काँटों से बिँध फूल को आते मधुकर लोगों नहीं रहे।२।
**
केवल आँच जला देती है सावन में भी देखो अब
ज्लाला से लड़ बचने वाले वो घर लोगों नहीं रहे।३।
**
एक तो पहले से मुश्किल थी ये कोरोना क्या आया
‌रोज कमा खाने के भी अब अवसर लोगों नहीं रहे।४।
**
एक समय था दुख से लड़ने चौपालें सज जाती थीं
खुशियों में भी आज साथ के मन्जर लोगों नहीं रहे।५।
**
देख के हस्ती या दौलत को होते अब तैयार यहाँ
‌जान बचाने वाले सबकी अफसर लोगों नहीं रहे।६।
**
जातधर्म को छोड़ो भी तो धनदौलत या रुतवे हैं
कहने भर को ऊँच नीच के अन्तर लोगों नहीं रहे।७।
**
टाट फटे फुटपाथों के या मखमल वाले महलों में
नींद की बातों से अनजाने बिस्तर लोगों नहीं रहे।८।
*
मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 28, 2020 at 6:39pm

आ. भाई आशीष जी सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए आभार ।

Comment by आशीष यादव on August 26, 2020 at 12:11am

एक उम्दा ग़ज़ल हुई है। सच्चे भावों को पिरोया है आपने। बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 24, 2020 at 7:19am

आ. भाई बृजेश कुमार जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 24, 2020 at 7:16am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार । आशा है भविष्य में भी स्नेह मिलता रहेगा । 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 24, 2020 at 7:12am

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर आपकी उपस्थिति से लेखन सफल हुआ । स्नेह के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 24, 2020 at 7:10am

आ. डिम्पल जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 22, 2020 at 10:08am

बढ़िया ग़ज़ल हुई आदरणीय धामी जी...

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 21, 2020 at 10:36pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें । सादर। 

Comment by Samar kabeer on August 21, 2020 at 3:58pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Dimple Sharma on August 21, 2020 at 10:52am

आदरणीय लक्ष्मण धामी'मुसाफिर'जी नमस्ते, खुबसूरत ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार करें आदरणीय,तीसरा शेर कमाल है बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें आदरणीय।

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