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रुठ जाते हैं कभी दिन के उजाले मुझसे..( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122. 1122. 1122. 22.

रूठ जाते हैं कभी दिन के उजाले मुझसे
अब नहीं जाते अँधेरे ये सँभाले मुझसे (1)

सूख जाता है गला प्यास के मारे जब भी
दूर हो जाते हैं पानी के पियाले मुझसे    (2)

क़ैद रक्खा है मुझे उसने कई सालों से
चाबियों का भी पता पूछ न ताले मुझसे (3)

सामने मेरे बहुत लोग यहाँ भूखे हैं
आज निगले नहीं जाएँगे निवाले मुझसे (4)

हाथ जब मेरे सलीबें ही उठाना चाहें
ख़ार अब माँग रहे पैरों के छाले मुझसे  (5)

इक ज़माना था कभी साथ दिखा करते थे
दूर ही रहते हैं अब देखने वाले मुझसे   (6)

क्यों नहीं छपती यहाँ ग़ज़लें तुम्हारी 'सालिक'
पूछते रहते हैं हर दिन ही रिसाले मुझसे (7)

*मौलिक एवं अप्रकाशित.

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Comment by सालिक गणवीर on October 15, 2020 at 9:48am

आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर' साहिब
सादर अभिवादन
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और सराहना के लिए ह्रदय तल से आपका आभारी हूँ.

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 14, 2020 at 8:48pm

आदरणीय सालिक गणवीर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई दिली मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं। सादर।

Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 4:02pm

आदरणीय कबीर साहिब

सानी कुछ यूँ लिखा है....

अब नहीं जाते अँधेरे ये सँभाले मुझसे....

Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 1:16pm

आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तह-ए -दिल से शुक्रिया ।

Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 1:14pm

आदरणीया रचना भाटिया जी
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तह-ए -दिल से शुक्रिया ।

Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 1:12pm

आदरणीय निलेश 'नूर' साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तह-ए -दिल से शुक्रिया । आपकी इस्लाह पर मश्क़ करता हूँ ,जनाब ।

Comment by सालिक गणवीर on October 14, 2020 at 1:08pm

आदरणीय समर कबीर साहिब

आदाब
ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिती और हौसला अफ़ज़ाई के लिए तह-ए -दिल से ममनून हूँ। आपकी इस्लाह का मुंतज़िर था. मतला पर मश्क़ करता हूँ ,मुहतरम।

Comment by Rachna Bhatia on October 14, 2020 at 11:52am

आदरणीय सालिक गणवीर जी, बेहतरीन अशआर हुए हैं।दूसरा बहुत अच्छा लगा।मतले पर गुणिजनों से सहमत हूँ।

Comment by Samar kabeer on October 14, 2020 at 11:49am

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'रूठ जाते हैं कभी दिन के उजाले मुझसे
या उलझते हैं कभी रात के जाले मुझसे'

मतले के दोनों मिसरों में 'जाले' की क़ैद हो रही है, देखिये ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2020 at 11:46am

आ. सालिक जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है.
बधाई स्वीकार करें..
मतले को लेकर संशय है.. उजाले और जाले में कहीं जाले की क़ैद न हो रही हो.. वैसे राहत इन्दौरी साहब की ग़ज़लों में ऐसा अक्सर देखने मिलता है जैसे..
शह्रों में तो बारूदों का मौसम है 
गाँव चलो अमरूदों का मौसम है.
.
या.
सरहदों पर बहुत तनाव.... चुनाव आदि ..
बड़े नाम मंच पर कुछ भी कर सकते हैं ... मैं स्वयं आश्वस्त नहीं हूँ कि सहीह क्या है ..
मंच के गुनीजनों से मार्गदर्शन की अपेक्षा है 
सादर  

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