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नहीं दो चार लगता है बहुत सारे बनाएगा.( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

1222 1222 1222 1222

नहीं दो-चार लगता है बहुत सारे बनाएगा
जहाँ मिलता नहीं पानी वो फ़व्वारे बनाएगा  (1)

ज़रूरत से ज़ियादा है शुगर मेरे बदन में पर
मुझे वो देखते ही फिर शकर-पारे बनाएगा  (2)

फ़लक के इन सितारों की तरह ही देखना इक दिन
ज़मीं पर भी ख़ुुदा अपने लिए तारे बनाएगा  (3)

ज़मीं पर पैर रखने की जगह दिखती नहीं उसको
फ़लक पर वो नये दो-तीन सय्यारे बनाएगा  (4)

जहाँ में ख़ुशनसीबों की नहीं दिखती कमी'सालिक'
ख़ुदा दो-चार तुझ जैसे भी बेचारे बनाएगा  (5)

*मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2020 at 8:44pm

शानदार ग़ज़ल कही है आदरणीय...

Comment by सालिक गणवीर on October 22, 2020 at 6:10pm

उस्ताद-ए -मुहतरम समर कबीर साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार। ग़ज़ल पर इस्लाह के लिए विशेष आभार आदरणीय। इस्लाह पर तामील कर दी है जनाब।
सलामत रहें।

Comment by सालिक गणवीर on October 22, 2020 at 6:06pm

आदरणीय अमीरूद्दीन 'अमीर' साहिब
आदाब
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार। ग़ज़ल पर समझाइश के लिए विशेष आभार।

Comment by सालिक गणवीर on October 22, 2020 at 5:57pm

आदरणीय भाई लक्मण धामी जी
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार।

Comment by सालिक गणवीर on October 22, 2020 at 5:53pm

प्रिय रूपम
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार। बालक शाइरी को विज्ञान से जोड़ना ठीक नहीं। सलामत रहें।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 20, 2020 at 10:50pm

आदरणीय सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें, मुहतरम समर कबीर साहिब का विश्लेषण क़ाबिल-ए-ग़ौर है।

रूपम जी मेरे ख़याल में ये मिसरा "फ़लक पर वो नये दो-तीन सय्यारे बनाएगा" विज्ञान के अनुसार सहीह है। क्योंकि कहकशांँ या आकाशगंगा भी फ़लक (अंतरिक्ष) में ही होती है। मिसाल के लिए ये अश'आ़र देखिये :

"पुराने हैं ये सितारे फ़लक भी फ़र्सूदा 

  जहाँ वो चाहिये मुझको कि हो अभी नौ-ख़ेज़".     - अल्लामा इक़बाल 

" फ़लक पे चाँद सितारे निकलने हैं हर शब

   सितम यही है निकलता नहीं हमारा चाँद".           - पंडित जवाहरनाथ साक़ी 

Comment by Samar kabeer on October 20, 2020 at 8:33pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'बनाए जुगनू हैं जिसने वही तारे बनाएगा'

जुगनू और तारे तो वो बना चुका है,आप क्या कहना चाहते हैं ?

'वो अपने तिफ़्ल की ख़ातिर तो गुब्बारे बनाएगा'

इस मिसरे में 'ग़ुब्बारे' ग़लत शब्द है,सहीह शब्द है "ग़ुबारा" बहुवचन "ग़ुबारे",देखियेगा ।

'बशर जो सो नहीं सकते वहीं पे सेज फूलों की
जहाँ बिस्तर नहीं होंगे थके-हारे बनाएगा'

इस शैर का भाव स्पष्ट नहीं हुआ,देखियेगा ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 20, 2020 at 1:15pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन। उम्दा गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

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